Wednesday, September 21, 2016

जलकुक्कड़ और तन्दूरी-चिकन


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छली पोस्ट में हमने वामियों के सन्दर्भ में ‘जलकुक्कड़’ का प्रयोग किया जिस पर सफ़र के साथी प्रदीप पाराशर ने जिज्ञासा दिखाई। ‘जलकुक्कड़’ एक मुहावरा है जो आमतौर पर ईर्ष्यालु के सन्दर्भ में इस्तेमाल होता है। यूँ इसमें शक, शंका, कपट, संदेह या डाह करने का भाव है। ‘सौतिया-डाह’ वाली जलन को मुहावरे में भी खूब महसूस किया जाता है। गौर करें, ये सभी भाव अग्नि से जुड़ते हैं। संदेह, शक या शंका दरअसल एक चिंगारी है। ‘डाह’ तो सीधे-सीधे दाह का ही रूपान्तर है। संस्कृत में ‘दह’ का आशय तपन, ताप, अगन, जलन, झुलसन से है।

जलकुक्कड़ में जो जल है वह ज़ाहिर है दाह या जलन वाले ‘जल’ के अर्थ में है न कि पानी वाले अर्थ में। कुक्कड़ यानी मुर्ग़। कुक्कड़ संस्कृत के कुक्कुट का देशी रूप है। कुक्कुट का कुर्कुट रूपान्तर होकर कुक्कड़ बना, ऐसा कृपा कुलकर्णी मराठी व्युत्पत्तिकोश में लिखते हैं। वैसे कुक्कुट से कुक्कड़ बनने के लिए कुर्कुट अवतार की ज़रूरत नहीं। ‘ट’ का रूपान्तर ‘ड़’ में होने से कुक्कुट सीधे ही कुक्कड़ बन जाता है।

जलकुक्कड़ को समझने के लिए “जल-भुन जाना” मुहावरे पर गौर करें। शरीर का कोई अंग आग के सम्पर्क में आने पर झुलस जाता है। जल-भुन वाले मुहावरे में यही जलन है। दूसरा मुहावरा देखिए- “जल-भुन कर कबाब होना”। कबाब एक ऐसा व्यंजन है जिसे सीधे तन्दूर पर या तवे पर खूब अच्छी तरह भूना जाता है। जब ज्यादा ही “अच्छी तरह” भून लिया जाए तो वह जल-भुन कर कोयला हो जाता है, कबाब नहीं रह जाता।

एक अन्य पद देखिए- “तन्दूरी-मुर्ग़”। मुर्ग़े को जब आग पर सालिम भूना जाता है उसे ही तन्दूरी-मुर्ग़ कहते हैं। कहते हैं, ये बेहद लज़ीज़ होता है। अब अगर इसका हाल भी कबाब जैसा हो जाए तो? आशय ईर्ष्याग्नि से ही है। ऐसा आवेग, उत्ताप जो मौन या मुखरता से झलके। इस कुढ़न को ही ये तमाम मुहावरे अभिव्यक्त कर रहे हैं। जलकुक्कड़ में भी यही आशय है।

कई बार पूछा जाता है कि फलाने का क्या हाल है? जवाब आता है कि खबर सुनने के बाद से “तन्दूरी-मुर्ग़” हो रहे हैं। कई लोग जो स्वभाव से दूसरों की खुशहाली देख कर कुढ़ते रहते हैं, हमेशा डाह रखते हैं या अपनी ईर्ष्या का प्रदर्शन करते रहते हैं उन्हें स्थायी तौर पर जलकुक्कड़ का ख़िताब मिल जाता है। वे हमेशा ईर्ष्या के तन्दूर पर जलते रहते हैं। ईर्ष्या की आग जिसमें तप कर कुन्दन नहीं कोयला ही बनता है। ऐसे ही लोगों के लिए हिन्दी में जलोकड़ा या जलोकड़ी जैसे विशेषण भी हैं। कभी कभी सिर्फ़ जलौक भी कह दिया जाता है।

प्रसंगवश बताते चलें कि कुक्कुट दरअसल ध्वनिअनुकरण के आधार पर बना शब्द है। संस्कृत में एकवर्णी धातुक्रिया ‘कु’ में दरअसल ध्वनि अनुकरण का आशय है अर्थात कुकु कुक या कुट कुट ध्वनि करना। कोयल, कौआ, कुक्कुट और कुत्ता में ‘कु’ की रिश्तेदारी है । दरअसल विकासक्रम में मनुष्य का जिन नैसर्गिक ध्वनियों से परिचय हुआ वे ‘कु’ से संबंद्ध थीं। पहाड़ों से गिरते पानी की , पत्थरों से टकराकर बहते पानी की ध्वनि में कलकल निनाद उसने सुना। स्वाभाविक था कि इन स्वरों में उसे क ध्वनि सुनाई पड़ी इसीलिए देवनागरी के ‘क’ वर्ण में ही ध्वनि शब्द निहित है। सो मुर्ग़ का कुक्कुट नामकरण दाना चुगने की ‘कुट-कुट’ ध्वनि के चलते हुआ। अंग्रेजी का कॉक cock भी इसी आधार पर बना है।

इसे भी देखें- कुक्कुट

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Tuesday, September 20, 2016

बालों की दवाई, शिकाकाई, कहाँ से आई...


सा बुन जैसी चीज़ का कभी प्राचीन भारत में चलन था या नहीं, इस पर हम अलग पोस्ट लिख चुके हैं। हाँ, त्वचा और बालों की देखभाल के देसी तरीकों का उल्लेख आयुर्वेद में है। शिकाकाई, रीठा, आँवला जैसी दर्जनो वनौषधियों का प्रयोग हिन्दुस्तान में होता आया है। ख़ैर, शिकाकाई बेहद लोकप्रिय ओषधि है और इसके इस्तेमाल की विधियाँ अब विदेशी कास्मेटिक्स में भी नज़र आती हैं। मूलतः यह द्रविड़ भाषा का शब्द है और तमिळ के ज़रिये भारतीय भाषाओं में प्रसारित हुआ है।

सिगा, सिगाई और जूड़ा
जानते हैं शिकाकाई शब्द की जन्मकुण्डली। जब पढ़ते थे तब शिकाकाई शब्द जापानी भाषा का लगता था। पिछली बार जब सोलापुर गए तो इस सन्दर्भ में कुछ बातें पता चली थीं। वहाँ के पुराने बाज़ार में तरह-तरह की जड़ीबूटियाँ बिक रही थीं। कुछ दवाओं और तेल आदि के विज्ञापनों में बालों का जूड़ा प्रदर्शित था। सोलापुर का आन्ध्रप्रदेश से गहरा सम्बन्ध है। वहाँ तेलुगुभाषी बहुतायत रहते हैं। बहरहाल, एक ऐसी दुकान पर भी पहुँचे जहाँ विशुद्ध रूप से बालों की देखभाल वाली जड़ीबूटियाँ ही थीं। वहाँ जूड़े के लिए अनेक लोगों के मुँह से ‘सिगा’ अथवा ‘सिगाई’ शब्द सुना।

शिखण्डी से रिश्तेदारी
जब उन्हें बताया कि मैं मराठी हूँ तो दुकानदार ने सिर की तरफ़ इशारा किया, शेंडी शेंडी। मराठी में शेंडी का अर्थ होता है जूड़ा या सिर के बीच लपेट कर रखी चुटिया। शेंडी बना है शिखण्डिका से। शिख+ अण्ड में शिखण्ड यानी जूड़े का भाव है। शिख यानी सिर के सबसे ऊँचे हिस्से पर बालों से बनाया अण्डाकार गुच्छा यानी शिखण्ड। संस्कृत में इसके लिए चूड़ा शब्द भी है। चूड़ाकरण का अर्थ मुण्डन भी होता है। चूड़ा का ही अगला रूप जूड़ा है।

सिका, सिकु, सिक्कम्
बहरहाल, शिखण्डिका के शिख या शिखा से अचानक तेलुगू का ‘सिगा’ पकड़ में आ गया जो अन्यथा नहीं आता। चार्ल्स फिलिप ब्राऊन के तेलुगू कोश में सिगा और सिका दोनों की प्रविष्टि है और उसका अर्थ जूड़ा, चोटीगुच्छ, चूड़ा या शिखा आदि ही बताया गया है। तमिळ लैक्सिकन में इसके कई रूप प्रचलित हैं जैसे- सिका, सिक्कु, सिक्कम्, सिकाईताटू, सिकरिन, सिकुरम आदि। इनके संस्कृत रूपान्तर की कल्पना की जा सकती है मसलन शिखा, शिखु, शिखरम्, शिखरिणी आदि। द्रविड़ भाषाओँ में संस्कृत की तत्सम शब्दावली के नितान्त देसी रूप इस तरह घुले-मिले हैं कि यह कहना कठिन है कि संस्कृत ने द्रविड़ को प्रभावित किया है द्रविड़ ने संस्कृत को।

काई यानी फल, सिका यानी शिखा
गौरतलब है कि तमिल में काई यानी kay फल के अर्थ में प्रयुक्त होता है। अनेक सन्दर्भों में इसका अर्थ कच्चा फल, सूखा फल भी दिया गया है। तो सिका-काई का अर्थ हुआ शिखा- काई अर्थात चूड़ा-फल या शिखाफल। ज़ाहिर है कि इस नामकरण के पीछे बालों के काम आने वाला फल से ही तात्पर्य है। शिकाकाई का वानस्पतिक नाम अकेशिया कोनसिन्ना है।

शेखर और शिखरिणी
शिकाकाई ज्यादातर गर्म जलवायु में पैदा होने वाली झाड़ी है। इसका तेल भी बनाया जाता है और इसे पीस कर विभिन्न प्रकार की ओषधियाँ भी बनाई जाती हैं। ध्यान रहे, शिव को शेखर कहते हैं क्योंकि वे सिर पर जटा बान्धते हैं। इसका रिश्ता गंगा से है। इसीलिए उसका नाम शिखरिणी भी है। पूर्वांचल के लोग अपने नाम के साथ शेखर लगाना पसंद करते हैं।

देखें फेसबुक पर शिकाकाई
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Friday, September 16, 2016

हनक यानी उन्माद

त्तर प्रदेश और बिहार में 'हनक' शब्द बहुत प्रचलित है। मध्यप्रदेश में इसका बर्ताव नहीं के बराबर है। बाकी बिहार के अरवल से हरियाणा के पलवल तक इसका प्रसार है। 'हनक' का प्रयोग इन इलाकों में आमतौर पर ठसक, हेकड़ी, गर्व, अकड़, अभिमान, दर्प या मद का भाव है। मूल रूप से यह अरबी ज़बान का शब्द है और फ़ारसी के रास्ते हिन्दी में आया है। यह सेमिटिक धातु हा-नून-क़ाफ़ ح نِ ق से बना है जिसमें तेज़ी, तमक, तर्रारी, तैश, रुआब के साथ-साथ रोष, दुश्मनी, उग्रता, आगबबूला या प्रतिशोध जैसे आशय भी हैं। अक्सर अख़बारों में सियासत की गर्मी का बखान करनेवाले सन्दर्भों में इसका प्रयोग देखने को मिलता है। कुर्सी की हनक, सत्ता की हनक, वर्दी की हनक, राजनीति की हनक आदि। इससे हनकी शब्द भी बनता है जिसका अर्थ है गुस्सैल, नाराज़, क्रोधी, प्रतिशोधी, उन्मादी या पागल आदि। किन्तु यह शब्द चलन में नहीं है। गौर करें हनक में मूलतः उग्रता का भाव है और उग्रता एक किस्म की ‘अति’ है जिसे समझदारों ने वर्जित माना है। सत्ता उन्मादी बनाती है। रुआब जब अपने ज़ोर पर होता है तब उन्माद की शक्ल अख़्तियार करता है।

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Wednesday, August 17, 2016

अथ “डिकरा-डिकरी” कथा


न्तति के प्रति स्नेह के सम्बोधन खूब लोकप्रिय होते हैं। इनमें अनेक भाषाओं के शब्द समाहित होते हैं। प्रसार माध्यमों के ज़रिये ऐसे अनेक शब्द हिन्दी और अन्य प्रादेशिक भाषाओं में भी प्रचलित हो जाते हैं। लाडेसर, बेटू, बिट्टू, बालू, बाला, बच्चन, गुंडा, गुंडुराव, मुन्ना, मुंडा, छोटू, नन्हा आदि। ऐसा ही एक शब्द है डीकरा जो मराठी में भी है पर अल्पप्रचलित है। खानदेश की तरफ़ अहिराणी बोली में डिकरा, डिकरी का अर्थ होता है पोता या पोती। गुजराती में इसे बेटा बेटी के अर्थ में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। कुछ सिन्धी क्षेत्रों में भी इसकी व्याप्ति है। हमने सबसे पहले इसका प्रयोग मुम्बइया फ़िल्मों में पारसी पात्रों के मुँह से सुना। अब हिन्दी में भी नाटकीय संवाद में इसे बरता जाने लगा है।

डिकरा यानी सेवक
‘डिकरा’ की अर्थवत्ता सेवक से ठीक उसी तरह जुड़ती है जैसे अरबी के गुलाम की, बाक़ी मतलब दोनों का बच्चा ही है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि गुलाम में जहाँ सेवक का भाव रूढ़ हो गया वहीं ‘डिकरा’ में बच्चे का। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्तिकोश में डिकरा संस्कृत के ‘डिङ्गर’ से विकसित हुआ है। अमरकोश में ‘डिङ्गर’ का अर्थ सेवक ही है। ‘डिङ्गर’ का एक रूप मराठी में ढिंगर भी होता है। इसका ही परवर्ती विकास डिकरा हुआ। इसी तरह गुजराती में ढिकरा भी बोला जाता है।

रामसेवक और गुलामनबी
गौर करें अरबी में ‘गुलाम’ शब्द सेमिटिक ग़ैन-लाम-मीम غ-ل-م से बना है जिसमें लड़का, ख़ूबसूरत युवती, वासना, लालसा, सीमोल्लघन जैसे भाव हैं। ध्यान रहे, दुनियाभर में पुराने दौर से ही बाल-मज़दूरी भी रही है। अरब देशों में इसका चलन अरब के कारोबारी अतीत के मद्देनज़र भी समझा जाना चाहिए। इसका एक रूप हाल के दिनों में बच्चों की ऊँट दौड़ तक में नज़र आता रहा है। जिस तरह हमारे यहाँ रामसेवक का अर्थ राम के आराधक से है उसी तरह गुलामनबी या गुलाम मोहम्मद का भी हुआ। किन्तु दूसरे अर्थों में गुलामनबी का अर्थ जिसे नबी ने पाला हो अर्थात नबी का पुत्र भी होता है। इस तरह हम रामसेवक या रामदास को नहीं देख सकते। पूर्वी बोली में इस अर्थ में रामबालक अलग व्यक्तिनाम है।

गुलाम जो बच्चा था
दासप्रथा के चलते अरब में बड़े पैमाने पर दासों का कारोबार होता था। ये लोग श्रमिकों से लेकर घरेलु सेवादार तक होते थे। प्रायः हर समाज में मालिक को सेवक का पिता कहा गया है क्योंकि वह उन्हें पालता है। मुमकिन है अरब समाज में गुलाम शब्द का प्रयोग क्रीतदासों के लिए इसी रूप में होने लगा हो और बाद में वह सेवक के अर्थ में ही इतना रूढ़ हो गया कि अब तो नौकर शब्द भी गुलाम से ज्यादा रसूख रखता है। नौकर तो सेवा की एवज में तनख्वाह पाता है मगर गुलाम तो सिर्फ हुक्म बजाता है। जहाँ तक डिङ्गर का प्रश्न है, यह मूलतः सेवक ही था। उपरोक्त गुलाम की व्याख्या के मुताबिक ही बाद में इसमें बच्चे का भाव समा गया होगा, ऐसा लगता है। अपने मराठी-गुजराती रूपों में डिकरा / डिक्रा का मूलार्थ बच्चा, सन्तान, पुत्र या शिशु ही होता है।

मोबेदजीना डिकरा-डिकरी
पारसियों का अल्पप्रचलित कुटुम्ब नाम मोबेदजीना भी है। इसकी कथा में डिकरा-डिकरी का दख़ल है। बताया जाता है इस कुटुम्ब के पूर्वपुरुष का नाम मोबेद था। जिसका अर्थ पुजारी/ पुरोहित (दस्तूर-मोबेद) होता है। मोबेद के वंशज पहले ईरान से चल कर गुजरात आए और फिर अपने कुटुम्ब के साथ मुम्बई आ बसे। उन्हें परम्परानुसार इलाके में ‘मोबेदजी’ कहा जाने लगा। उनकी अनेक सन्तानें थी जिन्हें मोहल्ले में मोबेदजीनां डिकरा-डिकरी, ऐसा कह कर परिचय दिया जाता था। समाज में भाषायी पद जब शब्द का रूप लेते हैं तब संक्षेपीकरण होता जाता है। ज़ाहिर है यहाँ भी वही हुआ। मोबेदजी के बाल-बच्चे" की अर्थवत्ता वाला यह वाक्य सिर्फ मोबेदजीना के अर्थ में पितृपुरुष मोबेद के कुटुम्ब की अभिव्यक्ति देने लगा।
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Saturday, August 6, 2016

कुछ ‘दन्द-फन्द’ कर लिया जाए


हि न्दी में दो दन्द चलते हैं। एक दंद (दन्द) है जो तद्भव रूप है और दूसरा फ़ारसी आप्रवासी। एक का अभिप्राय युद्ध, संघर्ष, रस्साकशी, हलचल आदि है। यह दंद संस्कृत के द्वन्द्व से आ रहा है। दूसरा दंद फ़ारसी का है जिसका अर्थ है दाँत, दाँतेदार, तीखा, नोकदार। हिन्दी में दंद का अकेला प्रयोग बहुत कम होता है। दंद-फंद मुहावरे के साथ ही यह देखने में आता है।

दन्द यानी जोड़ा या जद्दोजहद

संस्कृत क्रियामूल द्व / द्वि में दो का आशय है और द्वन्द्व इससे ही बना है जिसका का अर्थ है संग्राम, लड़ाई, झगड़ा, हाथापाई, संघर्ष वग़ैरह। इसमें दो का भाव साफ़ नज़र आ रहा है। हिन्दी का दो भी द्व से ही बना है। द्वक, द्वय, द्वन्द्व, जैसे शब्दों में दो और दो, सम्मुख, जोड़ा, युगल, जद्दोजहद, परस्पर, स्पर्धा, होड़, तकरार, अनबन, आज़माइश जैसे भाव हैं। यही नहीं, मूलतः द्वन्द्व में परस्पर विपरीत जोड़ी का आशय भी है इसलिए इसका अर्थ स्त्री-पुरुष युगल भी है। व्याकरण में द्वन्द्व समास होता है। समास युग्मपद है। परस्पर विलोम या विपरीतार्थी शब्द भी द्वन्द्व की मिसाल है मसलन सुख-दुख, रात-दिन वगैरह।

फन्द यानी गिरह
दंद की तर्ज़ फर फंद का इसमें जोड़ा जाना लोकअभिव्यक्ति की सफलता है। भाषा ऐसे पदों से ही समृद्ध होती है। यह जो फंद है, यह दन्द का अनुकरणात्मक पद न होते हुए स्वतन्त्र शब्द है जो ‘फंदा’ वाली शृंखला से आ रहा है। फन्द यानी बन्धन या पाश। देवनागरी में प > फ > ब > भ की शृंखला के शब्द स्थानीय प्रभाव के चलते विभिन्न बोलियों में एकदूसरे की जगह लेते हैं। बन्ध का लोकरूप फन्द हो जाता है। बन्ध में जहाँ किसी भी किस्म के अवरोध, रोक, गिरह या गाँठ का भाव है वहीं फन्दा सिर्फ़ गाँठ है। बान्धने की क्रिया सिर्फ़ गाँठ से ही व्यक्त नहीं होती। पानी को रोकने वाली व्यवस्था बान्ध इसलिए कहलाती है क्योंकि उसे बान्ध दिया गया है। फन्दा भी एक किस्म का बन्धन है पर हर बन्धन फन्दा नहीं। अलबत्ता फन्दा जहाँ गाँठ है वही इसी तर्ज़ पर बन्धा गाँठ न होकर डैम या बान्ध को कहते हैं।

जी-तोड़ प्रपंच
अब दंद-फंद की बात। मूल रूप से अपने मक़सद की कामयाबी के लिए हर मुमकिन और हर तरह के प्रयासों को अभिव्यक्त करने वाला पद है दंद-फंद पर अब इसका प्रयोग नकारात्मक अर्थ में ही ज़्यादा होता है। आज की हिन्दी में इस पद में चालबाजी, षड्यन्त्र, हथकण्डा, दाँव-पेच, खटराग, कूटनीति जैसी अभिव्यक्तियाँ समा गई हैं। द्वन्द्व से बने दन्द से यहाँ ज़ोर-आज़माइश प्रमुख है वहीं फन्द में फँसाने का भाव है। कुल मिला कर उचित-अनुचित का विचार किए बिना उद्धेश्यपूर्ति का प्रयत्न दरअल दंद-फंद की श्रेणी में आता है। हालाँकि सामान्य तौर पर जी-तोड़ मेहनत के अर्थ में भी इसका प्रयोग होता है जैसे- “सारे दन्द-फन्द कर लिए, तब कहीं काम मिला” या “वहाँ किराए के मकान के लिए बड़े दन्द-फन्द करने पड़ते हैं” वगैरा वगैरा।

दन्दाँ तुर्श करदन
जिस तरह संस्कृत में विसर्ग का उच्चार ‘ह’ होता है पर अक्सर वह ‘आ’ में परिवर्तित हो जाता है। फ़ारसी में शब्द के अन्त में ‘हे’ का प्रयोग इसी तरह होता है। संस्कृत के दन्त यानी दाँत का फ़ारसी समानार्थी दंदानह دندانه है जो दाल, नून, दाल,अलिफ़, नून, हे से मिलकर बना है। हिन्दी में इसका उच्चार दंदाना होता है जिसका अर्थ हुआ दाँता, दाँतेदार, नुकीला, नोकदार आदि। फ़ारसी में कहावत है “दन्दाँ तुर्श करदन” इसकी तर्ज़ पर हिन्दी में दाँत खट्टे करना कहावत बनाई गई। दन्द-फन्द वाले दन्द से दाँतेदार दन्द का कुछ लेना-देना नहीं।
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Friday, July 29, 2016

'कमाल' की बात



ज देखते हैं कमाल की कुण्डली। हम सब अधूरे हैं। आम आदमी इस अधूरेपन को पूरा करने के चक्कर में ईश्वर का आविष्कार कर बैठा। ज्ञानमार्गियों ने पूर्णता की व्याख्या अनेक तरीकों से करते हुए अध्यात्म और दर्शन का घनघोर संसार रच दिया। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकला कि हर कोई अगर अपना अपना काम सही ढंग से करता चला जाए तो बात पूरी हो जाती है।

पूर्णता में ही 'कमाल'
यह जो पूर्णता है बड़ी चमत्कारी है। किसी चीज़ के पूरा होने का अहसास हमें गहरी शान्ति से भर देता है। पूर्णता सुख का सर्जन करती है और आगे बढ़ने का रास्ता खोलती है। हमारे हाथों उस चमत्कारी भविष्य की नींव रखी जाती है जिसके लिए हमने ईश्वर का आविष्कार किया था। ज्ञानियों ने इस कर्मयोग को ही ईश्वरोपासना कह दिया। बहरहाल पूर्णता में ही ‘कमाल’ है।

उपज्यो पूत 'कमाल'
अरबी से फ़ारसी होते हुए हिन्दी में आए कमाल के डीएनए में इसी पूर्णता का भाव है। कबीर ताउम्र इन्सानियत की बात करते रहे। वे सन्त थे। ज्ञानमार्गी थे जिसका मक़सद सम्पूर्णता की खोज था। आख़िर क्यों न वे अपने पुत्र का नाम कमाल रखते ! कमाल अपने पूरे कुनबे के साथ उर्दू में है और कुछ संगी साथी हिन्दी में भी नज़र आते हैं। कमाल کمال बना है अरबी की मूलक्रिया कमल کمل से जो मूलतः क-म-ल है, अर्थात काफ़(ک) मीम( م ) लाम (ل) से जिसमें पूर्ण होने, पूर्ण करने का भाव है।

'कमाल' का चमत्कार
इस तरह कमाल में परम, सम्पूर्णता, सिद्धि, पराकाष्ठा, सर्वोत्कृष्टता जैसे भाव स्थापित हुए हिन्दी में कमाल का बर्ताव चमत्कारी, अद्भुत या आश्चर्यजनक के अर्थ में ज्यादा होता है। जबकि इसका मूल भाव Completion, perfection या entire है। जब कोई चीज़ अपनी सम्पूर्णता में रची जाती है या घटित होती है तब सामान्य मनुष्य के लिए वह आश्चर्य ही होता है। इसीलिए सम्पूर्ण उपलब्धि को हम अनोखापन मानते हैं।

'कमाल' के मुहावरे
हिन्दी में कमाल दिखाना, कमाल करना, कमाल है जैसे मुहावरे हमारी रोज़मर्रा की अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं। इनके बिना काम नहीं चलता। कमाल शब्द ग्रामीण बोली से लेकर शहरी ज़बान में छाया हुआ है। “कमाल की चीज़’, ‘कमाल की बात”, “कमाल की एक्टिंग”, “कमाल की सोच”, “कमाल की तकनीक”, “कमाल का हुनर”, “कमाल का आदमी”, “कमाल की औरत” जैसे दर्जनों पद हम रोज़ इस्तेमाल करते हैं जिसमें कमाल का अर्थ या तो प्रवीणता, पराकाष्ठा है अन्यथा आश्चर्य का भाव है।

'कमाल' का कुटुम्ब
कमाल-कुटुम्ब का ही एक अन्य शब्द है जो सम्पूर्णता के अर्थ में हिन्दी में प्रतिष्ठित है वह है مکمل मुकम्मल। कुछ लोग मुकम्मिल भी लिखते हैं। अनेक लोग मुक्कमल लिख देते हैं। सही मुकम्मल है अर्थात मीम काफ मीम लाम। मुकम्मल बना है कमाल से पहले ‘मु’ उपसर्ग लगने से जो मूलतः सम्बन्धकारक है।

'कमाल' यानी सम्पूर्णता

जिसमें सम्पूर्णता का गुण है उसका अर्थ होगा सम्पूर्ण। सो मुकम्मल में सम्पूर्ण, सर्वोत्कृष्टता जैसे भाव हैं। मुकम्मल वह है जो परिपूर्ण है, निर्मित है, बना हुआ है। वह जिसमें कुछ भी करने को शेष न रह गया हो। इसी कड़ी में आता है कामिल کامل इसमें भी यही सारे भाव समाहित हैं। कामिल अरबी की प्रसिद्ध और लोकप्रिय पुरुषवाची संज्ञा भी है। अखिल,योग्य, परिपूर्ण, सम्पूर्ण, सक्षम जैसी अर्थवत्ता इसमें है।

नामों में 'कमाल'
इसी तरह ताकमाल, मुकतामिल, ताकमुल, ताकमिल, कमालान जैसे पुरुषवाची नाम हैं तो कामिलात, कामिलिया, कमिल्ला जैसे स्त्रीवाची नाम भी इसी मूल से निकले हैं जिनमें उपरोक्त भाव ही हैं। इस कड़ी के ये सभी शब्त अरबी, फ़ारसी, हिन्दी, तुर्की, अज़रबैजानी, स्वाहिली, इंडोनेशियाई आदि अनेक भाषाओं में इस्तेमाल होते हैं। हिन्दी के अलावा अनेक भारतीय भाषाओं में भी इस शृंखला के शब्द हैं।

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Thursday, July 21, 2016

मोरचा सम्भाले...


हि हिन्दी में दो तरह का मोरचा प्रचलित है। एक मोरचा वह है जो लोहे को ख़राब कर देता है। धार कुंद कर देता है। जिसे ज़ंग लगना कहते हैं। संयोग से दूसरा मोर्चा भी जंग से ही जुड़ा है, बस नुक़ते का फ़र्क़ है। उसे जंग का मोरचा कहते हैं। दोनो ही मोरचे फ़ारसी से आयातित हैं। ग़ौर करें कि हिन्दी में युद्धस्थल पर तैनाती की जगह वाला मोरचा ज़्यादा प्रचलित है। ज़ंग के अर्थ वाला मोरचा अब हिन्दी में कम प्रयोग होता है। हाँ आंचलिक बोलियों में बना हुआ है। मोरचा मूलतः مورچال है यानी मोरचाल जो मीम वाव रे चे अलिफ़ लाम से मिलकर बनता है। पर हिन्दी में मोरचा ही प्रचलित हुआ।


अनेक लोग इसकी वर्तनी ‘मोर्चा’ भी लिखते हैं। मूलतः मोरचा में "अंकन करना" जैसे भाव हैं जिनका आशय था सीमा या सरहद का निर्धारण। इसके साथ ही इसमें निशान लगाना, धार करना, कगार, किनारा जैसे आशय भी शामिल हुए। भारत और यूरोप की भाषाओं में इसी अर्थशृंखला से विकसित होकर अनेक शब्द बने हैं। वक़्त के साथ-साथ इसमें चौहद्दी बनाना, क़िला बनाना भी शामिल हो गया।

कोई भी चौहद्दी से घिरी जगह दरअसल अधिकार क्षेत्र का प्रतीक होती है। रक्षा प्रणालियों का जब विकास हुआ तो क़िला या गढ़ी के इर्दगिर्द खाई खोदना भी प्रमुख रणनीति बनी बाद में खाई क़िला निर्माण का अनिवार्य हिस्सा हो गई। खाई दरअसल सैनिको के छुपने के लिए भी खोदी जाती थी और दुश्मन के लिए रोक का काम भी करती थी। कभी इसमें पानी भरा जाता था तो कभी कांटे बिछाए जाते थे।

इसी तरह खुदाई कर खोहनुमा जगह बनाना जिसमें छुप कर एक या दो फौजी छुप कर वार कर सकें, खंदक कहलाती है। दरअसल इन्हीं सारी क्रियाओं को मोर्चाबंदी कहा जाता है अर्थात सुरक्षा के सारे उपाय करना। इस तरह देखें तो खंदक का अर्थ ही मोर्चा हुआ जहाँ पर स्थित फ़ौजी दुश्मन पर तक तक कर वार करता है। मोरचे पर जाना यानी कर्तव्य स्थल पर जाना। मोरचा सम्भालना यानी जिम्मेदारी सम्भालना। मोरचा मारना यानी लक्ष्य पर पहुँचना, जीत जाना आदि।

यूरोप की अनेक भाषाओं की रिश्तेदारी संस्कृत, अवेस्ता से रही है। इसे आर्यभाषा परिवार के नाम से भी समझा जाता है और भारत-यूरोपीय (भारोपीय) भाषा परिवार के नाम से भी। भाषा विज्ञानियों ने मोर्चा श्रृंखला के शब्दों का मूल जानने के लिए प्रोटो भारोपीय धातु मर्ग / मर्ज की कल्पना की है जिसमें सीमा, चिह्नांकन या मोर्चाबंदी करना जैसे भाव हैं।

अवेस्ता और वैदिक भाषा में काफी समानता रही है। वैदिकी के मर्ग, मर्क जैसे शब्दों में गति, गमन, निरीक्षण, आक्रमण जैसे भाव है। इन्ही क्रियाओं से मानव अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाता चलता था। फ़ारसी का मोरचा अवेस्ता के मारेज़ा से विकसित हुआ है जिसका अर्थ है सीमान्त या सरहद।

सीमा का निर्धारण निरन्तर चलते जाने की प्रक्रिया है। चलते हुए चिह्न बनाना इसमें प्रमुख है। अंग्रेजी का मार्जिन शब्द भी इसी मूल से आ रहा है जिसका अर्थ है सीमान्त, हाशिया, किनारा आदि। ये सब विकसित होती एक ही अर्थशृंखला की कड़ियाँ हैं। इसी तरह अंग्रेजी का मार्क शब्द है जिसका अर्थ भी निशान, चिह्न, ठप्पा, अंकन, मुहर, छाप, अंक आदि ही है।

अंग्रेजी के इसी मार्क से हिन्दी में ‘मार्का’ मुहावरा चल पड़ा था ठीक वैसे ही जैसे पिछले कुछ दशकों से ‘टाइप’ चल पड़ा हैं। जिसका आशय सादृश्यता सम्बन्धी है यानी “...किसी के जैसा”। सरकारी मार्का, फर्जी मार्का आदि। इसका अर्थ चिह्न से है पर भाव सादृष्यता का है। “यूपी टाइप,” “मूर्खटाइप” जैसे वाक्य प्रयोग भी यही कहते नज़र आते हैं।

हिन्दीमें रास्ते के अर्थ वाला मार्ग इसी कड़ी का शब्द है। कश्मीरी में मर्ग़ घास के विशाल चारागाह भी हैं। बाद में इनका अर्थ घाटी, रास्ता, मैदान भी हो गया। टंगमर्ग, गुलमर्ग, सोनमर्ग जैसे स्थान नामों में यही मर्ग है।
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Thursday, May 5, 2016

टीवी वाले पोंगा-पंडित


टी वी वाले आजकल चाहे जिस ज्ञान-पुंगव को पकड़ लाते हैं और पूरे देश से उसका परिचय धर्मगुरू कहकर कराते हैं। उनकी बकवास सुनकर भी शर्म आती है। माथे पर त्रिपुण्ड लगाने, उत्तरीय डाल लेने, गैरिकवस्त्र ओढ़ लेने मात्र से इनकी निगाह में कोई धर्मगुरू हो जाता है... कम से कम वाम विचारधारा वाले चैनल को तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए। अव्वल तो धर्म जैसी कोई चीज़ जब उनकी निगाह में नहीं है तब धर्मगुरू क्या चीज़ है? धर्मगुरू वैसे तो नहीं होते जैसे टीवी स्टूडियो में नज़र आते हैं। जैसे टीवी वालों को शब्द और अर्थ की समझ नहीं, वैसे ही धर्म और गुरू की भी समझ नहीं।

प्रसंगवश बताते चले हिन्दी में 'पोंगा' शब्द मूर्ख के अर्थ में इस्तेमाल होता है। पोंगा में खाली, रिक्त, खोखला, थोथा जैसे आशय हैं। अनेक भाषाशास्त्रीय साक्ष्य हैं जिनसे पता चलता है कि पोंगा शब्द दरअसल संस्कृत के 'पुंगव' शब्द का विकास है जिसमें अर्थापकर्ष की प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है। पुंगव का मूल अर्थ है अपने क्षेत्र का श्रेष्ठ, नायक, प्रमुख आदि। गौरतलब है नर-पुंगव का अर्थ है नर-श्रेष्ठ।

भाषिक विश्व में ‘ग’ और ‘ज’ में अदला-बदली होती है। गौर करें संस्कृत और हिन्दी के पुंज शब्द पर। हिन्दी की तत्सम शब्दावली में पुंज जिसमें समूह, राशि, अम्बार, आयतन, मात्रा जैसे भाव हैं। पुंज का ही एक रूप पुंग होता है। ज़ाहिर है 'ज' का रूपान्तर 'ग' में होने से पुंज से पुंग बन जाता है। पुंग का अर्थ भी अम्बार, राशि या मात्रा होता है। इससे ही बना है पुंगव जिसमें गुणों की खान, गुणों का समूह, गुणराशि का भाव निहित है। किसी व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ या गुणों की खान होना ही उसे नायक, मुखिया अथवा पुंगव बनाता है। ज्ञानपुंज, प्रतिभापुंज पर भी दूसरे अर्थ में गौर कर लें।

पुंज से ही पूंजी शब्द बना है जिसका अर्थ भी राशि या समूह ही होता है। समाज के नायकों जैसे अर्जुन को नर-पुंगव कहा जाता है। इसी तरह गुरुओं में श्रेष्ठ को गुरू-पुंगव होता है। अक्सर यह होता है कि जब समाज अपने आदर्शों को फ़िसलते देखता है तब उस शब्द के मानी भी बदल जाते हैं। इसे अर्थापकर्ष कहा जाता है यानी लफ्ज़ों का अपने मायने खो देना। दिखावटी समाज में जब मूर्ख लोग गाल बजाने लगें, जयचंद जैसे लोग नायक होने लगें और सन्तों को जेल में शरण मिलने लगे तब पुंगव का अर्थ पोंगा हो जाता है- यानी खोखला, खाली, पोला।

पुंगव से पहले पोंगा बना फिर पुंगी और पोंगली जैसे शब्द भी बन गए जिसका अर्थ नली, खोखल आदि होता है। पुंगी एक किस्म की पीपनी को भी कहते हैं जिसमें हवा फूँकने से बड़ी तेज पीsss आवाज़ होती है। खोखल से हवा के गुज़रने पर ध्वनि निकलती ही है। मस्तिष्क में अगर चिन्तन होगा तो ज्ञान उद्भूत होता है। वर्ना यह समझ लिया जाता है कि उसमें भूसा भरा है। पाण्डित्य प्रदर्शन ऐसी वृत्ति है जिससे बिरले ही बच पाते हैं।

थोथा चना, बाजे घना को ही ले, वजह वही है, खाली जगह पर आवाज़ पैदा होती है। बिना ज्ञान का पण्डित गाल बजाता है... पंडित सोइ जो गाल बजावा। कुछ स्थानों पर इसे मूरख सोई जो गाल बजावा भी कहा गया है। सो ऐसे ज्ञानियों को लोक में बतौर पोंगा-पण्डित ख्याति मिल जाती है। पोंगा-पण्डित का अर्थ है पाण्डित्य जताने का प्रयास करने वाला ऐसा व्यक्ति जो मूलतः मूर्ख है।
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Monday, February 29, 2016

चूँ-चपड़ नई करने का...


पर लिखी नसीहत से किसी न किसी दौर में सभी गुज़र चुके हैं। फ़ारसी का यह ज़रा सा ‘चूँ’ बड़ा विकट है। ...और बच्चों का ‘चूँ’ तो और भी खतरनाक! आखिर उन्हें धमकाना ही पड़ता है “ज्यादा चूँ-चपड़ किया तो भगा देंगे” (चपड़ अनुकरणात्मक है। इसका एक आशय प्रतिरोध को दबाना भी है। ज़ाहिर है प्रतिरोध सवालों के साथ ही उभरता है इसलिए किसी भी प्रतिवाद या प्रतिरोध को दबाने के लिए भी इसी मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है, चूँ-चपड़ नई करने का... आशय सवालों से बरजने का ही है। मज़े की बात ये कि जिनकी रोज़ीरोटी ही ‘चूँ’ की मुनहसिर है, वे भी इस ‘चूँ’ से वास्ता नहीं रखते। हमारी मुराद अख़बारनवीसों से ही है। चलिए, खोलते हैं ‘चूँ’ की जन्मकुण्डली।

यह जानना बेहद जरूरी है कि सवालिया निशान के दायरे में जितने भी सवाल हैं, पूरी दुनिया में ‘क’ से ही अभिव्यक्त होते हैं। इसे अंग्रेजी में 5W & 1H अथवा “पंचवकार, एक हकार” कहा जाता है। हिन्दी में ‘ककारषष्ठी’ कहा जा सकता है। यह दिलचस्प है कि संस्कृत के किम् में एक साथ तमाम प्रश्नवाची जिज्ञासाएँ समाई हुई है अर्थात क्या, क्यों, कब, कहाँ आदि...। इस किम से ही हिन्दी के तमाम प्रश्नवाची सर्वनामों यानी ‘कौन’, ‘कब’, ‘कहाँ’, ‘क्या’, ‘कैसे’, ‘किस’ आदि पैदा हुए हैं। इनमें सबका अपना-अपना महत्व है। कोई भी मानवीय जिज्ञासा इन सवालों के बिना पूरी नहीं होती। कोई भी कथा तब तक पूरी नहीं होती जब तक इस ‘ककारषष्ठी’ का समावेश उसमें न कर दिया जाए।

पत्रकारिता में तो इन शब्दों का महत्व गीता-कुरान-बाइबल से भी ज्यादा है। किसी भी घटना/ वारदात/ प्रसंग को जब तक इन कब-क्यों से न गुज़ारा जाए, उसे खबर की शक्ल में ढाला नहीं जा सकता। अफ़सोस कि आज के पत्रकार खबर लिखने से पहले ‘ककारषष्ठी’ मन्त्र का आह्वान नहीं करते। शायद शर्म आती होगी तो ‘6K’ की तरह याद कर लें, इसे भूल कर कोई खबर बन नहीं सकती और आप साख कमा नहीं सकते।

तो ‘किम्’ से जन्में ‘क्यों ‘का ही एक रूप है ‘चूँ’ जिसमें सवाल छिपे हैं। ध्यान रहे कि बच्चे ‘क’ और ‘च’ ध्वनियाँ सहज रूप से उच्चार लेते हैं मगर संयुक्त ध्वनियों का उच्चार नहीं कर पाते। यह समस्या अनेक मानव समूहों में भी होती है। नासिक्य स्पर्श के साथ क+य से बने क्यों का रूपान्तर ‘चों’ जाता है। अनेक लोग इसी प्रश्नवाचक चों को उच्चारते हैं। ‘क्यों’ का एक रूप फ़ारसी-उर्दू में ‘क्यूँ’ हो जाता है। स्वाभाविक है कि ‘क्यों’ से ‘चों’ की तरह ‘क्यूँ’ से ‘चूँ’ भी बन जाता है।

अब ‘क्यूँ’ हो या ‘चूँ’, है तो सवाल ही। ...और हमारा समाज जवाबदेही से हमेशा बचता नज़र आता है। भाषाओं के विकास में ही मानव-विकास नज़र आता है। लोकतन्त्र विरोधी समाज ही सवालों से कतराता है। “ज्यादा चूँ-चपड़ की तो...” एकाधिकारवादी, सामन्तवादी और सवालों से कतराते समाज की अभिव्यक्ति है। इसमें यह निहित है कि ज्यादा सवाल पूछेंगे, तो ख़ैर नहीं।

इस तब्सरे के बाद यह समझना मुश्किल नहीं बात बात में बोला जाने वाला अव्यय ‘चूँकि’ यूँ तो फ़ारसी का है पर ‘क्यूँकि’ का ही रूपान्तर है। हालाँकि जॉन प्लॉट्स ‘चूँ’ को फ़ारसी के ‘चिगुन’ से व्युत्पन्न मानते हैं जिसमें क्यों, कहाँ, कैसे का भाव है। सवाल यह है कि जब फ़ारसी में स्वतन्त्र रूप में ‘चि’ अव्यय मौजूद है और उसमें भी वही प्रश्नवाची आशय मौजूद है तब ‘चिगुन’ स्वयं ‘चि’ से व्युत्पन्न है जिसका रिश्ता ‘किम’ से है। शब्दों का सफ़र में पहले बताया जा चुका है कि पुरानी फ़ारसी-तुर्की में ‘किम्’ का एक रूप ‘चिम्’ होता हुआ ‘चि’ में तब्दील हुआ है।

तो चूँकि में क्योंकि वाले आशय समाहित है अर्थात ‘इसलिए’, ‘जैसे कि’, ‘कारण कि’ वगैरह आशय इससे स्पष्ट होते हैं। फ़ारसी में चूँ-चपड़ की जगह ‘चूँ-चिरा’ या ‘चूँ ओ चिरा’ पद प्रचलित है जिसका आशय है “कब, क्यों कहाँ”. इससे जो मुहावरा बनता है “चूँ-चिरा न करना” यानी बात वही ज्यादा सवाल न पूछो। हिन्दी ने इससे ही चूँ-चपड़ बना लिया। पुरानी हिन्दी में यह बतौर “चूँचरा” मौजूद है जिसका अर्थ है प्रतिरोध, विरोध, प्रतिवाद आदि।

निष्कर्ष- पत्रकारों को हमेशा चूँ-चपड़ करते रहना चाहिए यानी 'ककारषष्ठी' मन्त्र का जाप जारी रहे।

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Wednesday, January 27, 2016

खातून की खिदमत में...


‘ख़ा
तून’ भी हिन्दी क्षेत्र का जाना-पहचाना लफ़्ज़ है। इसमें भी बेग़म या खानुम की तरह कुलीन,प्रभावशाली स्त्री, साम्राज्ञी, भद्र महिला का भाव है जैसे मध्यकाल की ख्यात कश्मीरी कवयित्री हब्बा ख़ातून। बेग से बेगम और खान से ख़ानुम की तरह ख़ातून का रिश्ता 'क्षत्रप' से है। बात कुछ जमी नहीं। चलिए, बेग़म और ख़ानुम की तरह ख़ातून के जन्मसूत्रों को भी टटोला जाए। वैसे तो ख़ातून फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में दाखिल हुआ मगर यह तुर्की मूल का शब्द माना जाता है। इसका विकास हुआ है ईरान के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में बोली जाने वाली सोग्दी और खोतानी भाषा के ‘ख्वातवा’ या खाता जैसे शब्दों से जिसमें ज़मींदार का आशय था। गौरतलब है कि तुर्की में खातून का हातून रूप ज्यादा प्रचलित है। इतिहास की किताबों में हम सबने क्षत्रप और महाक्षत्रप जैसे पदनाम पढ़े हैं। ये ईरानी मूल के शब्द हैं और हखामनी साम्राज्य की उपाधियाँ हैं। उस समय तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी और नासिक इनकी प्रमुख राजधानियां थीं।

गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र भी इनके प्रभुत्व में था। क्षत्रप का चलन आमतौर पर युवराज के लिए होता था जबकि महाक्षत्रप राज्यपाल, सूबेदार या प्रान्तपाल को कहते थे। गौरतलब है शक जाति के लोग सोग्दी ज़बान बोलते थे और उपाधियों उन्हीं के शासनकाल की हैं। इन स्थानों के प्रधान शक शासक महाक्षत्रप कहलाते थे जबकि कनिष्ठ शासक या उप शासक क्षत्रप कहलाते थे।

‘क्षत्रप’ शब्द का प्रसार इतना था कि एशिया में जहां कहीं यूनानी और शक साम्राज्य के अवशेष थे, उन स्थानों के गवर्नर या राज्यपालों का उल्लेख भी सट्रप / खत्रप / ख्वातवा / शत्रप के रूप में ही मिलता है। शक जाति के लोग संभवतः उत्तर पश्चिमी चीन के निवासी थे। वैसे जब ये भारत में आए तब तक इनका फैलाव समूचे मध्य एशिया में हो चुका था। ईरान की पहचान शकों से होती थी।

दक्षिणी पूर्वी ईरान को ‘सीस्तान’ कहा जाता था जिसका अर्थ था ‘शकस्थान’। संस्कृत ग्रंथों में भारत से पश्चिम में सिंध से लेकर अफ़गानिस्तान, ईरान आदि क्षेत्र को शकद्वीप कहा गया है अर्थात यहां शकों का शासन था। ब्राह्मणों की एक शाखा शाकद्वीपीय भी मानी जाती है। शायद यही मागी ब्राह्मण थे जिनका रिश्ता मगध से था, जिन्हें बाद में शाकद्वीपीय कहा गया।

संस्कृत के क्षत्र में भी प्रभुत्व, साम्राज्य, वंश, आधिपत्य के आशय हैं। इसी कड़ी का क्षेत्र शब्द भूमि के अर्थ में भी हम जानते हैं। खेत इसी क्षेत्र का अपभ्रंश है। संस्कृत का क्षत्री भी राजकुल वाले अर्थ से कालान्तर में राजपूत जाति के अर्थ में क्षत्रीय में ढल गया। इसका एक रूप पंजाब में खत्री बना। नेपाली में यह छेत्री होता है। इस तरह क्षत्रप का खत्रप भी हुआ। तो ईरानी क्षत्रप का सोग्दी रूप ख्वातवा हुआ।

हमारा अनुमान है कि यहाँ ‘क्ष’ का रूपान्तर ‘ख्व’ हुआ होगा, ‘त्र’ का सिर्फ़ ‘त’ शेष रहा। भारत-ईरानी भाषाओं में ‘प’ का रूपान्त ‘व’ में हो जाता है। इसे यूँ समझ सकते हैं- क्षत्रप > ख्वतप > ख्वातवा। इसका रूप कहीं कहीं खाता / ख्वाती भी मिलता है जिसका अर्थ प्रमुख, परम, अधिपति, राजा, सामन्त आदि था।

ऐतिहासिक सन्दर्भों में बुम-ख़्वातवा जैसे सन्दर्भ भी मिलते है। यहाँ बुम वही है जो संस्कृत हिन्दी में भूमि है। इस तरह बुम-ख़्वातवा का आशय ज़मींदार, क्षेत्रपाल या क्षेत्रपति हुआ जो आमतौर पर राजाओं की उपाधि है। तो सोग्दी ज़बान के ख्वातवा या खाती का स्त्रीवाची हुआ ख़्वातीन या ख़ातून जिसमें राजा, श्रीमन्त, सामन्त की स्त्री अथवा कुलीन या भद्र महिला का आशय था। उर्दू में ख़ातून का बहुवचन ख़वातीन होता है।

प्रसंगवश संस्कृत के ‘क्ष’ वर्ण में क्षेत्र, भूमि, किसान और रक्षक का अर्थ छुपा है। क्षत्रप शब्द ईरान में शत्रप / खत्रप रूप में प्रसारित था जहाँ से यह ग्रीक में सट्रप बन कर पहुँचा। ग्रीक ग्रंथों में ईरान और भारत के क्षत्रपों का उल्लेख इसी शब्द से हुआ है। इसकी व्युत्पत्ति प्राचीन ईरानी के क्षत्रपवान से मानी जाती है जिसका अर्थ है राज्य का रक्षक। इसमें क्षत्र+पा+वान का मेल है। ‘क्षत्र’ यानी राज्य, ‘पा’ यानी रक्षा करना, पालन करना और ‘वान’ यानी करनेवाला।

गौर करें इससे ही बना है फारसी का शहरबान शब्द जिसमें नगरपाल का भाव है। इसे मेयर समझा जा सकता है। याद रखें संस्कृत के वान प्रत्यय का ही फारसी रूप है बान जैसे निगहबान, दरबान, मेहरबान आदि। संस्कृत वान के ही वन्त या मन्त जैसे रूप भी हैं जैसे श्रीवान या श्रीमन्त। रूपवान या रूपवंत आदि।
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Friday, January 22, 2016

‘खानम’ और ‘बेग़म’ की कथा


संगीत की दुनिया की खानम और बेग़मः  फ़रीदा ख़ानम और  बेग़म अख़्तर
मुस्लिम महिलाओं के नाम के साथ सम्मानसूचक विशेषणों में बेग़म, खानम/खानुम का भी शुमार है। आमतौर पर कोश इनके बारे में यही जानकारी देते हैं कि बेग़म फ़ारसी और खानुम तुर्की शब्द है और ये दोनों ही बेग और खान उपाधियों के स्त्रीवाची हैं। स्वाभाविक है इसे उसी तरह लिख दिया गया है मानो तहसीलदार से तहसीलदारनी और जमादार से जमादारनी। मगर बात इतनी आसान नहीं है। अनेक लोग इसे राजा या रानी वाला मामला समझते हैं, दरअसल वैसा भी नहीं। बेग़म और ख़ानुम का रिश्ता दरअसल रसूख़दार स्त्री से है।

खान और बेग आमतौर पर तुर्क-मंगोलों के कुलीन समूहों के आम प्रत्यय हैं जिनसे प्रतिष्ठा, प्रभाव, सम्मान और शक्ति का एहसास कराया जाता है। साफ़ है कि राजपरिवारों और सामन्तों द्वारा इन उपनामों का इस्तेमाल किया जाता रहा। यूँ समझ लें कि काफी कुछ श्रीमान-श्रीमती की तरह बेग-बेग़म और खान-खानुम के भी आशय हैं। बस, बेग़म और खानुम की निर्माण प्रक्रिया एक सी है और ये दोनों शब्द महज़ स्त्रीवाची प्रत्ययों के जोड़ने भर से सामने नहीं आए। हालाँकि इनकी

बेग़म और खानुम दोनों ही शब्दों के साथ अरबी का उम्म जुड़ा है जिसका आशय बीज, उद्गम, स्रोत, मूल और सर्वोच्च से है। इस तरह इस शब्द में माँ की अर्थस्थापना होती है क्योंकि माँ में जननिभाव है। सृष्टि का निर्माण उसी से माना गया है। वह जन्मदात्री है। अरबी के उम्म की रिश्तेतारी प्राचीन अक्कादी भाषा के अम्मु से है जिसमें संरक्षण और समूहवाची भाव हैं।
दरअसल यह सेमिटिक भाषा परिवार का इतना महत्वपूर्ण शब्द है कि इस “आम” की अर्थवत्ता के एक छोर पर माँ है, दूसरे पर अवाम है तो तीसरे पर मुल्क । दिलचस्प बात यह कि सेमिटिक भाषा परिवार की कई भाषाओं में “अम्मु” शब्द का वर्ण विपर्यय होकर माँ के आशय वाले शब्द बने हैं जैसे अक्कद में “उम्मु” ummu, अरबी में “उम्म”, हिब्रू में “एम”, सीरियाई में “एमा” आदि । मेरी नज़र में शिशु जिन मूल ध्वनियों को अनायास निकालता है उनमें सर्वाधिक ‘म’ वर्ण वाली ही होती हैं यथा अम् , मम् , हुम्म् आदि । अक्कद भाषा के “अम्मु” और “उम्मु” दरअसल पालन-पोषण वाले भावों को ही व्यक्त कर रहे हैं।

वैदिकी और संस्कृत के “अम्बु”, “अप्” और अक्कद भाषा के “अम्मु”, “उम्मु” में अन्तर्सम्बन्ध के ये संकेत बहुत साफ़ हैं। इससे मिलते जुलते शब्दों का जलवाची, जननिवाची भाव साबित करता है कि इन शब्दों का विकास भौगोलिक भिन्नता के बावजूद एक जैसा रहा है। तो इस तरह अरबी के उम्म में माँ समेत पोषण, स्रोत, आधार या मूल जैसे आशय समाए। उर्दू में अम्मी इसी उम्म से आ रहा है। मम्मी, अम्मा, मम्मा, मॉम, माँ सब के मूल में जलवाची अम्ब ही है, ऐसा लगता है।

तो इस तरह खान से खान और बेग के साथ उम्म जुड़ने से अपने समूह की प्रभावशाली महिला की अर्थवत्ता मिली जिसमें माँ भी है और समूह भी। हालाँकि बेग़ और खान पर शब्दों का सफ़र में विस्तार से चर्चा की जा चुकी है फिर भी संक्षेप में बताते चलें कि भारत-ईरानी परिवार में भग, बाग, बेग जैसे शब्दों में अंश, श्री, समृद्धि, शक्ति जैसे भाव हैं। हिन्दी संस्कृत के भाग्य, भगवान, भक्त जैसे शब्दों से लेकर फ़ारसी के बेग, बाग, बहादुर, बेक, बहा, बख़्श में भी यह नज़र आता है। बेग़ और साफ़ नज़रा आता है उज़बेक में जिसके पीछे उज़बेकिस्तान है। यही भारत में उज़बक कहलाता है जिसमें गंवार या असभ्य का भाव है। कुछ विद्वान इस BAG में उद्यान के अर्थ वाला बाग़ भी देखते हैं जिसकी व्याख्या समृद्ध भूमि, ऐश्वर्य भूमि के रूप में है। बगीचा इसका ही रूप है। बगराम, बगदाद, बागेवान जैसे शहरों के नामों के पीछे यही अर्थ छुपा है। इस क़तार में अनेक शब्द हैं।

जहाँ तक ख़ान का सवाल है, इसमें मंगोल और चीनी संस्कृति का भाषायी आधार है। इसकी व्युत्पत्ति संभवतः चीन के महान वंश हान से है। चीन के मध्यप्रान्त शांक्सी से होकर गुज़रनेवाली हानशुई नदी के नाम पर चीन के प्राचीन और प्रसिद्ध हान वंश का नामकरण हुआ। यह ठीक वैसे ही है जैसे सिन्धु नदी के नाम पर सैन्धव सभ्यता की पहचान बनी। चीनी भाषा का एक उपसर्ग है के-ke जिसमें महानता, सर्वोच्चता का भाव है। हान han से पहले के जुड़ने से बना ke-han जिससे कुछ नए शब्द जैसे काघान, कागान kagan, खाकान khakan या कान kan सामने आए। उक्त मंगोल रूपांतर बने। मंगोल भाषा में इन सभी नामों में शासक या सत्ता के सर्वोच्च पदाधिकारी का भाव था। यह जानना दिलचस्प है कि कुबलाई खान और चंगेज़ खान जैसे महान खान, मुसलमान नहीं थे। कुबलाई खान बौद्धधर्म की एक विशेष शाखा का अनुयायी था जबकि चंगेज़ खान चीन के शॉमन पंथ का अनुयायी था।
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Monday, January 18, 2016

‘फ़ैशनपरस्त’ से ‘वामपरस्त’ तक


हिन्दी में सरपरस्त, खुदपरस्त, बुतपरस्त जैसे शब्द खुब बोले-सुने जाते हैं। दरअसल फ़ारसी में ‘परस्त’ जैसा एक कारसाज़ औज़ार (प्रत्यय) है जिसे किसी भी शब्द के पीछे जोड़ कर एक नया शब्द बनाया जा सकता है। यहाँ तक कि विदेशी शब्दों के साथ भी उसे जोड़ा जा सकता है मसलन खुद फ़ारसी वालों ने अरबी के हुस्न से जोड़ कर ‘हुस्नपरस्त’ बना डाला। अंग्रेजी के फ़ैशन से इसे मिला दिया और ‘फ़ैशनपरस्त’ बन गया जो हिन्दी में भी बड़ा मशहूर है। तो चलिए इस ‘परस्त’ का आगा-पीछा तलाशा जाए।

भारोपीय भाषाओं में आधार, स्थित अथवा स्थान के लिए ‘स्थ’ स्थि, स्था (sta, stha) जैसे मूलक्रिया रूप हैं जिनसे ऐसे सैकड़ों शब्द बने हैं जिनका रिश्ता खड़े रहने (स्टैंड), ठहरने, रुकने, थमने (स्टे), स्थान (आस्तान, स्तान) या गमन करने, जाने (प्रस्थान) जैसे अंग्रेजी, उर्दू व हिन्दी शब्दों से है। इनके ज़रिये स्थिति का बोध होता है, किसी से जुड़ने की जानकारी मिलती है। हिन्दी के स्तम्भ, स्तब्ध, स्थल हों या अंग्रेजी के स्टूल, स्टॉल, स्टेशन से लेकर अरेस्ट, असिस्ट जैसे शब्द हों, गौर करें तो इन सबमें ‘स्थ्’, ‘स्था’ (sth, stha) की छाया दिखाई देगी। तो संस्कृत में भी ‘स्थ’ से बने अनेक शब्द है जिनमें ‘प्रस्थ’ का भी शुमार है और जिसका आशय है स्थिर, अटल, अचल, दृढ़, टिकाऊ, मज़बूत, पुख़्ता, अविचल, समतल, बराबर, चौरस, समस्तरीय, मैदान, आधार, सपाट, बंधाव, जुड़ाव, साथ जाना, साथ चलना जैसे लगभग मिलते-जुलते आशय हैं।

‘स्थ’ से बने कुछ शब्दों में इसका आशय एकदम स्पष्ट होता नज़र आता है मसलन ध्यानस्थ, सिंहस्थ, योगस्थ, गृहस्थ या प्रस्थ से बने इन्द्रप्रस्थ, खाण्डवप्रस्थ जैसे शब्दों से स्पष्ट होता है। यही ‘प्रस्थ’ जब ‘वन’ से जुड़ता है तो वानप्रस्थ बनता है जिसका मूल आशय तो गृहस्थाश्रम के अगले पड़ाव से है। प्राचीनकाल में सभी जिम्मेदारियाँ निभाने के बाद लोग वनवास करने चले जाते थे ताकि शान्ति से जी सकें। यूँ वानप्रस्थ में वनगमन का भाव भी है और वनवास करने का भी। प्रस्थ में साथ चलने, साथ जाने का आशय भी है।

इसी ‘प्रस्थ’ का फ़ारसी रूप होता है ‘परस्त’। गौरतलब है वैदिक संस्कृत और अवेस्ता में बहनापा रहा है अर्थात काफी समानता रही है। संस्कृत का ‘प्र’ उपसर्ग अवेस्ता में ‘फ्र’ या ‘फ्रा’ में बदल जाता है। प्रस्थ का अवेस्ता में समरूप ‘फ्रस्त’ है और फ़ारसी में इससे ‘पर’ बन जाता है। डीएन मैकेंजी के पहलवी कोश में परस्ताक, परस्तिह, पिरिस्त, परिस्तदन, परिस्तिश्न जैसे रूप मिलते हैं। फ़ारसी में इसका परस्त रूप सामने आया जिसमें तत्पर, निष्ठावान, अनुरागी, भक्त, आराधक जैसे अर्थ निहित थे। आशय समर्पणयुक्त साहचर्य या सहगमन का ही था। ध्यान रहे ‘प्रस्थ’ में निहित साथ चलने (प्रस्थान) का भी आशय है। शृद्धालु पन्थ के साथ चलता है। समर्पित व्यक्ति भी साथ-साथ चलता है। सो ‘परस्त’ से ही ‘परस्तिश’ भी बन गया जिसका अर्थ है पूजा, अर्चना, आराधना हो गया। ‘परस्त’ से ही बन गया ‘परस्तार’ यानी सेवक या सहचर। यह पहलवी में भी है।

अब देखें कि बुत से परस्त जुड़कर बुतपरस्त में मूर्तिपूजक नज़र आता है और हुस्न से वाबस्ता होकर परस्त सौन्दर्योपासक बन जाता है। इसी तरह खुद से चस्पा होकर खुदपरस्त बन जाता है स्वार्थी, अहंकारी। पूजास्थल के अर्थ में इसी कड़ी में परस्तिशक़दा या परस्तिशखाना भी जुड़ जाते हैं। अब हिन्दीवालों को सोचना है कि इस प्रस्थ या परस्त से वो और कौन कौन से नए शब्द बना सकते हैं। दो शब्द तो हम अभी दे रहे हैं। प्रस्थ से वामप्रस्थी और परस्त से वामपरस्त।
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Saturday, January 16, 2016

‘उलाहना’ तो प्रेरणा है, भर्त्सना नहीं


ळमा और ‘उरहन’ जैसे शब्दों में कुछ समानता नज़र आती है ? इन दोनों के बीच मारवाड़ और ब्रज के बीच की दूरी ज़रूर है पर दोनों का मूल एक ही है। दरअसल हिन्दी में जिसे उलाहना कहते हैं उसका राजस्थानी रूप ओळमा है और ब्रज, अवधी रूप उरहन या उराहन/ उराहना हैं। इसमें में शिकवा-शिकायत का भाव है या निन्दा का ? दरअसल हिन्दी के शब्दकोश तो ये दोनों ही भाव बताते हैं पर हमारा मानना कुछ और है। उपालम्भ में निन्दा करने, दोष गिनाने, शिकवा करने से ज्यादा उसे प्रेरित करने, प्रवृत्त करने, सचेत करने, समझाने, अनुभव कराने के आशय ज्यादा हैं।

उलाहना शब्द का रिश्ता संस्कृत के उपालम्भ से जोड़ा जाता है। इसका प्राकृत रूप उवालंभ है। इसका विकास ओलंभ होता है। राजस्थानी में यह ओळमा हो जाता है। उपालम्भ का अर्थ है धिक्कार, भर्त्सना, झिड़क, कोसना, घुड़की, आक्षेप, तिरस्कार, निन्दा, दुर्वचन, कुबोल, डाँट या वर्जना, निषेध, रोक, पाबंदी आदि। उपालम्भ बना है उप+आलम्भ से। हिन्दी में आलम्भ शब्द में छूने, स्पर्ष करने, अपनाने जैसे आशय हैं। इसमें ‘उप’ सर्ग जुड़ने से आशय एकदम स्पष्ट होता है।

किसी आश्रय के ज़रिये, किसी बहाने से छूना, स्पर्ष करना या अधिकार जताना-अपना बनाना। ध्यान रहे उपालम्भ के जितने भी अर्थ हमने ऊपर देखे वे सभी नकारात्मक हैं। हालाँकि उनका आशय यह लगाया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को वास्तविकता का बोध कराने के लिए कहे गए कटुबोल दरअसल उसे अपना बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। किन्तु प्रश्न यही है कि उलाहना का अर्थ सीधे सीधे गाली या दुर्वचन नहीं है। उलाहना में हमेशा तिरस्कार, भर्त्सना या धिक्कार का भाव भी नहीं होता। अलबत्ता उसमें आक्षेप, व्यंग्य ज़रूर होता है।

हमारा मानना है कि हिन्दी के ‘उलाहना’ का विकास प्राकृत के उपलंभणा से हुआ है जिसका संस्कृत प्रतिरूप ‘उपलम्भन’ है। ध्यान रहे उपलम्भना में बोध, समझ, अनुभव के साथ ही देखना, बूझना जैसे भाव भी हैं। उलाहना इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि आप किसी को कोसना चाहते हैं, बल्कि उलाहना उसे दिया जाता है जिससे अपेक्षित प्रतिसाद न मिले, जो अपने कर्तव्य को भूल जाए। उलाहना चेतना जगाता है, जागरुक करता है, जिम्मेदारी की याद दिलाता है। उपलम्भना या उपालम्भ दोनों ही शब्दों के मूल में लभ् धातुक्रिया है जिसमें पाना, सोचना, समझना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे ‘ल’ का रूपान्तर ‘र’ में होता है। ‘लभ्’ का अगला रूप ‘रभ्’ होता है। जिस तरह ‘लभ्’ से ‘लम्भ’ होता है उसी तरह ‘रभ्’ से ‘रम्भ’ होता है। ‘रम्भ’ से ही ‘आरम्भ’ भी बनता है जिसका अर्थ है शुरुआत। उलाहना इसी नई शुरुआत के लिए तो दिया जाता है।

तो उलाहना में दरअसल इसी शुरुआत का संकेत है, उत्प्रेरण है। उपलम्भना > उवलम्भना में ज्ञानप्राप्ति भी है और आक्षेपयुक्त प्रेरणा भी। रत्नावली का उलाहना ही तुलसी के लिए मानस-सृजन की प्रेरणा बना। इसलिए हमारा स्पष्ट मानना है कि उलाहना के मूल में उपालम्भ नहीं बल्कि उपलम्भणा है। इसकी पुष्टि हरगोविंददास त्रिकमचंद सेठ के प्राकृत कोश “पाइय सद्द महण्णवो” से भी होती है। हिन्दी के उलाहना का विकास उपलंभणा > उवलंभना > उलांभना > उलाहना के क्रम में हुआ है। राजस्थानी ओळमा भी उपलंभणा से ही उळांभणा >ओळमा के क्रम में सामने आया। ब्रज/ अवधी का उराहना भी इसी कड़ी में उपलंभणा > उराहना > उरहन से विकसित हुआ है।

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Friday, January 15, 2016

सुब्हान तेरी कुदरत यानी ‘सुभानअल्ला’



मो हतसिब तस्बीह के दाने पे ये गिनता रहा
किन ने पी, किन ने न पी, किन किन के आगे जाम था

मुमकिन है इस मशहूर शेर को पढ़ कर आप सुभानअल्ला कह उठें। ये है ही इस लायक। पर आप ‘सुभानअल्ला’ ये सुनकर भी कहेंगे कि ‘तस्बीह’ और ‘सुभान’ दोनो बहन-भाई हैं। ‘सुभानअल्ला’ को बतौर प्रशस्तिसूचक अव्यय हिन्दी में भी बरता जाता है। यूँ इसका प्रयोग विस्मयकारी आह्लाद प्रकट करने के लिए भी होता है। यह लगभग ‘क्याब्बात’, ‘अद्भुत’ या ‘ग़ज़ब’ जैसा मामला है। यूँ सुभानअल्ला में बहुत अच्छा, धन्य-धन्य अथवा वाह-वाह जैसी बात है। ऐसा भी कह सकते हैं कि सुभानअल्ला में vow factor भी है। जानते हैं सुभानअल्ला की जन्मकुण्डली।

सुभानअल्ला अरबी से बरास्ता फ़ारसी हिन्दी में आया है। यह एक शब्द नहीं बल्कि संयुक्त पद है। मूल रूप से अरबी का ‘सुब्हान’ ही हिन्दी में सुभान बन कर ढल गया। अरबी सुब्हान बना है त्रिवर्णी मूलक्रिया सबाहा ح ب س
यानी सीन-बा-हा से जिसमें परमेश्वर के गुणगान और प्रशस्ति का भाव है। इसका ही विकसित रूप है सुब्हान سبحان (सीन बा हा अलिफ़ नून) जिसका फ़ारसी रूप सोब्हान होता है और हिन्दी सुभान।

दरअसल सबाहा यानी सीन-बा-हा में जो मूल भाव है उसमें अनंत का भाव है मसलन विशाल जलराशि में तैरना, वह सब जो दृष्टिपटल के सामने है, जो नज़रों में है उसके वैभव को अनुभव करना। तैरते हुए देखने के इस भाव को हिन्दू संस्कृति में संसार को भवसागर मानने के रूपक से समझा जा सकता है। उस अनंत को निहारना, उसकी विशालता को अनुभव करते हुए उसमें बने रहने का भाव ही सबाहा का मूल है। और हासिल ? हासिल वह है जो बलदेवप्रसाद मिश्र की इस कविता के ज़रिये ज़ाहिर होता है-

जिस ओर निगाहें जाती हैं
उसके ही दर्शन पाती हैं
सम्पूर्ण दिशाएं सुख -सानी
उसका ही गौरव गाती हैं
तो सबाह से बने सुब्हान में सचमुच सुब्हान तेरी कुदरत का ही आशय है। प्रकृति से कोई पार नहीं पा सका है। प्रकृति ही ईश्वर है। जो कुछ हमने नहीं रचा, पर जो सब हमारे लिये है। ऐसी अनुभूति के बाद अगर सुभानअल्ला जैसी उक्ति ही निकलती है।

इसी सबाहा से विकसित हुआ एक और शब्द है तस्बीह यानी सुमिरनी जिसका जन्म सुमिरन से हुआ। विश्व की कई प्राचीन संस्कृतियों में नाम स्मरण की परम्परा रही है। इस्लाम में भी नाम स्मरण का रिवाज़ है। परम्परा के अनुसार सुमिरनी को हाथ में पकड़ कर उस पर एक छोटी सफेद थैली डाल ली जाती है। तर्जनी उंगली और अंगूठे की मदद से नाम स्मरण करते हुए सुमिरनी के दानों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। सुमिरनी दरअसल एक उपकरण है जो नामस्मरण की आवृत्तियों का स्मरण भक्त को कराती है।

संस्कृत के स्मरण से विकसित है सुमिरन। स्मरण > सुमिरण > सुमिरन के क्रम में इसका विकास हुआ। पंजाबी में इसका रूप है ‘सिमरन’ जहाँ प्रॉपर नाऊन की तरह भी इसका प्रयोग होता है। व्यक्तिनाम की तरह स्त्री या पुरुष के नाम की तरह सिमरन का प्रयोग होता है। बहुतांश हिन्दीवाले पंजाबी के ‘सिमरन’ की संस्कृत के ‘स्मरण’ से रिश्तेदारी से अनजान हैं क्योंकि सुमिरन की तरह से पंजाबी के सिमरन का प्रयोग हिन्दीवाले नहीं करते हैं बल्कि उसे सिर्फ व्यक्तिनाम के तौर पर ही जानते हैं। स्मरण शब्द बना है संस्कृत की ‘स्मर्’ धातु से। मोनियर विलियम्स के संस्कृत इंग्लिश कोश के मुताबिक स्मर् में याद करना, न भूलना, कंठस्थ करना, याददाश्त जैसे भाव हैं। अंग्रेजी के मेमोरी से इसकी रिश्तेदारी है। डॉ रामविलास शर्मा के मुताबिक लैटिन के मैमॉर् अर्थात स्मृति में ‘मर्’ के स्थान पर मॉर है। संस्कृत के स्मर, स्मरण, स्मृति में स-युक्त यही मर् है।

तो जब कभी किसी अनिवर्चनीय अनुभव से गुज़रें, किसी अनोखेपन के लिए मुँह से प्रशस्तिसूचक ‘वाह’ निकले तो सुभानअल्ला कहने में गुरेज़ न करें। और हाँ, खुदा की कुदरत को भी सुब्हान कहें और “मेरे महबूब को किसने बनाया” ये पहेली खुदा को बूझने दीजिए।
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