Thursday, May 15, 2008

नन्हा कातो, महंगा बिकेगा...

नान्हां काती चित्त दे, महँगे मोल बिकाई ।
गाहक राजा राम हैं, और न नेड़ा आई।।


स दोहे में कबीर ने भक्ति के धागे को इतना महीन कातने की बात कही है जितना कोई और न कात सके क्योंकि ग्राहक तो सिर्फ भगवान राम ही हैं जो उसे महंगे मोल ही खरीदेंगे अर्थात सत्कर्मों का सही फल देंगे। इस दोहे में निहित आध्यात्मिक अर्थ पर अगर न भी जाएं तो भी यह साफ हो रहा है कि महीन कताई ही हमेशा से उत्तम समझी जाती है इसी लिए नन्हा कातना एक मुहावरा भी है जिसका मतलब होता है नफ़ीस या बारीक काम करना। कताई का काम वस्त्र निर्माण का प्रमुख हिस्सा रहा है। पुराने ज़माने से कपास ही दुनियाभर में वस्त्रनिर्माण के लिए धागा बनाने का बड़ा ज़रिया रहा है।

ताई शब्द कहां से आया? कताई या कातना जैसी क्रियाएं बनी है संस्कृत के कृत् से। कृत् बना है कृ धातु से जिसका मतलब होता है काटना, टुकड़े-टुकड़े करना, विभक्त करना अथवा कुछ करने के भाव वाले अर्थ इसमें शामिल हैं। कृत् में इन तमाम अर्थों के साथ कातना, कताई करना, घेरना आदि भाव भी शामिल हैं। कताई करने के लिए प्रयुक्त प्रमुख उपकरण को तकली कहते हैं । तकली भी इसी धातुमूल से उपजा शब्द है जिसके लिए संस्कृत में तर्कुः शब्द है जिसका अर्थ है लोहे की शलाका या घिरनी जिससे सूत(सूत्र-धागा) काता जाए। तर्कुः से बना तर्कुटिका जो हिन्दी में बना तकली। इससे ही बना तकुआ। तकुआ दरअसल चर्खे अथवा लूम का वह हिस्सा है जो गोल गोल घूमता है जिसमें सूत लपेटा जाता है।

साफ़ है कि कृत् में व्याप्त कातने और घेरने – दोनो ही क्रियाएं कताई, तकली, तकुआ में उजागर हो रही हैं। कृत् धातु से ही कतरनी, कतौनी, कतर-ब्यौंत , कतराना, कतवार , कतिन (बुनकर) जैसे शब्द भी बने हैं। कृ में मौजूद कृ ध्वनि और उसमें निहित विभक्त करने , नष्ट करने के भावों का विस्तार न सिर्फ प्राचीन भारोपीय परिवार में नज़र आता है बल्कि सेमेटिक परिवार की हिब्रू और अरबी जैसी भाषाओं में भी है। गौर करें अरबी लफ्ज़ क़त पर जिसका मतलब होता है काटना। इससे ही बने हैं कत्ल, कातिल, मक़तल जैसे तमाम शब्द । [विस्तार से देखें यहां ] सेमेटिक भाषाओं में एक अन्य शब्द है कत्न या कुत्न [kuttn] जिसका मतलब होता है कातना , पतला करना आदि। हिब्रू में इसका रूप है क़त्तन और अरबी में है कत्न । मिस्री ज़बान जो अरबी का ही रूप है , में भी यही शब्द चलता है ।

गौर करें कि दुनिया की सबसे नफ़ीस रूई का उत्पादन नील नदी की घाटी में होता है और इसे इजिप्शियन कॉटन कहा जाता है। अब साफ है कि रूई के लिए अंग्रेजी में जो कॉटन शब्द चला उसके मूल में भी यही क-त और कृ जैसी ध्वनियां ही हैं। सभ्यता के इतिहास में जिन चीज़ों का प्रायः दुनिया के हर क्षेत्र में साक्ष्य मिला है उनमें कपास, कॉटन या रुई हैं। दक्षिण अमेरिका से लेकर सुदूर पूर्व तक बिखरी पड़ी पुरातात्विक सामग्रियों से इसकी पुष्टि हुई है।

आपकी चिट्ठियां

सफर के पिछले पड़ाव - आलोक पुराणिक जिंदाबाद पर जिन साथियों की टिप्पणियां मिलीं उनमें हैं सर्वश्री- पंकज अवधिया, लावण्या शाह, मीनाक्षी, दिनेशराय द्विवेदी, समीर लाल, पंकज सुबीर , संजय पटेल, महाशक्ति, बेजी, डा चंद्रकुमार जैन, आलोक पुराणिक , शिवकुमार मिश्र, संजीत त्रिपाठी, अभिषेक ओझा, अविनाश वाचस्पति, दीपा पाठक और विजयशंकर चतुर्वेदी हैं। आप सबका शुक्रिया ।
हमारे ग़रीबखाने को पसंद किया सो उसका भी आभार ...आप सब मेरे यहां स्थायी रूप से आमंत्रित हैं ।

संजीत , ये उठा ले जा सको तो ले जाओ। पर इसकी जांच - परख के लिए भी एक बार तो यहां आना ज़रूरी है:)

विजयभाई, आप आइये तो सही , कैमरे की देखी जाएगी :)

4 कमेंट्स:

चंद्रभूषण said...

बहुत बढ़िया काते, लेकिन मेरी मेल का जवाब अबतक नहीं दिए।

अभिषेक ओझा said...

क से कतरनी से लेकर, त से तकली तक पुरा छान मारा आपने... हर बार की तरह बेहद ज्ञानवर्धक !

Dr. Chandra Kumar Jain said...

अजित जी,
शब्दों के धागों को भी आप
बहुत चित्त देकर कातते हैं.
ऐसा नन्हा कातना भावों के राम की
गाहकी के लिए बड़े काम की चीज़ है.
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ऐसी कताई के दीवानों को ही चदरिया
बुनने और ज्यों की त्यों धर देने की कला
रास आती है.... है न ?
आभार
डा.चंद्रकुमार जैन

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप का काम बंटी हुई दुनिया को जोड़ने के लिए अच्छा सीमेंट सिद्ध हो सकता है।

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