Monday, September 1, 2008

कमबख़्त को बख़्श दो ! [भगवान-1]

DivineLight शुक्रवार को ब्लागजगत में दो जगह भगवान के दर्शन हुए। पहली बार अनर्थ से , फिर अर्थ से । संयोग है कि शब्दों के सफर में भी इस शब्द को रविवार को ही आना था। अनर्थकारी ब्लागर ने दुर्योग से पहले लिख दिया। जाहिर है दिनेश जी जैसे सजग ब्लागर क्यों चुप रहते । उन्होनें बहुत संतुलित तरीके से उस पोस्ट की खबर ली। अन्य साथियो ने भी उलाहने दर्ज कराए। पेश है भगवान के संदर्भ की पहली कड़ी।
हते हैं कि समय बड़ा बलवान है यानी दुनिया में वक्त से बढ़कर कुछ नहीं । इस बात की सत्यता एक दूसरे मुहावरे में नजर आ जाती है कि वक्त किसी के लिए नहीं ठहता । इसीलिए यह नसीहत भी दी जाती है कि समय के साथ चलना सीखो।
मय और काल के अर्थ में हिन्दी में वक्त शब्द का इस्तेमाल खूब होता है। हिन्दी वाले इसे उर्दू का समझते हैं। इसके उद्गम को लेकर भाषाविद एकमत नहीं हैं । कुछ लोग इसे फ़ारसी का समझते हैं और कुछ इसे अरबी का । इनसाइक्लोपीडिया इरानिका के मु्ताबिक अरबी शब्द 'वक़्त' का स्रोत ईरानी है या नहीं यह अनिश्चित है, मगर यह सेमिटिक  मूल का नहीं है। किस मूल का है ये पता नहीं। फारसी में इसका उच्चारण कुछ इस तरह होता है कि यह वख्त बन जाता है मगर लिखते समय वक्त ही लिखा जाता है। वक्त इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की भारत-ईरानी शाखा का शब्द है। फारसी में वक्त का मतलब होता है हिस्सा यानी अंश। मूल रूप से इस अंश का अभिप्राय समय का एक हिस्सा, कालांश, ज़माना, ऋतु, मौसम आदि से है । उर्दू के अलावा हिन्दी में भी इस से बने कई शब्द प्रचलित है जैसे वक्तन फ वक्तन यानी कभी कभी, यदा कदा या समय समय पर। इसका ही एक रूप होता है वक्त ब वक्त।  आम इस्तेमाल होने वाला एक शब्दयुग्म वक्त बे वक्त भी है ।
क्त के कुछ अन्य रूप भी हैं जो फारसी के अलावा उर्दू हिन्दी में भी प्रचलित हैं जैसे बख्श और बख्त वर्ण के में तब्दील होने की जो प्रवृत्ति हिन्दी में है वही फारसी में भी है। वक्त का अगला रूप बख्त हुआ मगर यहां उसका अर्थ बदलकर हो गया भाग्य । समझा जा सकता है कि समय की महिमा में जो भी बातें कही जाती हैं वे उसे सबसे प्रबल और ताक़तवर साबित करती हैं , जाहिर है ये बातें प्रभावी होकर बख्त के अर्थ को भाग्य में बदल रही है। बख्त यानी भाग्य , किस्मत , प्रारब्ध आदि। मुस्लिम नामों के साथ इसका प्रयोग प्रायः भाग्य के अर्थ में ही किया जाता है जैसे सिकंदरबख़्त यानी अलेक्जेंडर दी ग्रेट जैसी किस्मतवाला। यहां यानी मुकद्दर का सिकंदर मुहावरे को याद कर सकते हैं।
स बख़्त से बना एक शब्द ऐसा है जो आमतौर पर लेखन या बातचीत में नाटकीयता लाने के लिए प्रयोग किया जाता है वह है कमबख्त। बहुत कम हिन्दीवाले इसका सही समय पर सही प्रयोग करते हैं। अक्सर नासमझ, बेवकूफ , मूर्ख या हद से हद हल्की फुल्की गाली की तर्ज पर इसका प्रयोग कर लिया जाता है जबकि इसका सही अर्थ हुआ बदकिस्मत, हतभाग्य, अभागा। बदबख्त भी इससे ही बना है। कमबख्त यानी अभागा तो भाग्यवान कौन ? जाहिर है बख्तावर यानी किस्मतवाला । यह शब्द पुरानी हिन्दी फिल्मों में सुनाई पड़ता था। दिलचस्प यह कि उर्दू फारसी में बख्तावर पुरुष का नाम भी हो सकता है और स्त्री का भी। वैसे वक्त का एक रूप राजस्थानी , मालवी समेत अन्य कई बोलियों में बखत भी बनता है।
ब बात बख़्श की । गौर करें कि वक्त में निहित अंश या हिस्सा भी बख़्श में प्रभावी हो रहा है और भाग्य वाला भी। बख़्श के मायने होते हैं अंश ,खंड,भाग्य ,हिस्सा, देनेवाला आदि। दान ,अनुदान, खैरात आदि को बख्शीश इसीलिए कहते हैं। उत्तर पंजाब ,कश्मीर और सरहदी इलाकों में आमतौर पर एक उपनाम होता है बख्शी जैसे आनंद बख़्शी । दरअसल यह बादशाही ज़माने में यह एक रुतबेदार पद होता था जिसका काम था फौज में तनख्वाह बांटना और टैक्स वसूलना। यह उसी तरह उपनाम बन गया जैसे कानूनगो, चौधरी और पटेल–पाटील उपनाम बने । बख्त जहां मुस्लिम नामों के साथ जुड़ता है वहीं बख्श हिन्दू नामों के साथ भी जुड़ता है जैसे रामबख्श, शिवबख़्श। इनका मतलब हुआ  राम और शिव की कृपा से जन्मे। अल्लाह बख़्श, खुदाबख़्श, नूरबख्श ऐसे ही नाम हैं जो मुस्लिमों में होते हैं।
अगली कड़ी में भगवान की महिमा का गुणगान.
आपकी चिट्ठियां
सफर की पिछली चार पोस्टों

  • सिक्काः कहीं ढला , कहीं चला
  • बंद कमरे में कैमरे की कारगुज़ारियां
  • कानून का डंडा या डंडे का कानून
  • सोने की रंगत, सोने का मोल...

  • पर सर्वश्री Sanjay Tarun कुश एक खूबसूरत ख्याल Anil Pusadkar Pankaj Parashar Radhika Budhkar Swati अविनाश वाचस्पति sidheshwer Lavanyam - Antarman  महेद्र मिश्रा महेन डा. अमर कुमार GIRISH BILLORE MUKUL makrand जितेन्द़ भगत Mrs. Asha Joglekar अनूप शुक्ल और Gyandutt Pandey की टिप्पणियां मिलीं। आप सबका तहेदिल से शुक्रिया । 

    @लावण्या शाह
    न वो ख़म है जुल्फे अयाज़ में
    कभी ऐ हक़ीक़ते मुंतजर....
    आपने इस गीत की याद दिला कर ग़ज़ब कर दिया...
    जब ये गीत अपने उरूज़ पर था तब मैं बच्चा था, मगर
    इसकी शोख़ धुन तब भी ग़ज़ब करती थी और आज भी।

    13 कमेंट्स:

    दिनेशराय द्विवेदी said...

    जेहन में जब ख़ुदा था, तो कमबख्त़ का आना हुआ।
    बहुत अच्छे अजित भाई, आज जिन शब्दों की व्याख्या की गई सभी आम-फ़हम हैं। बहुत काम आएंगे। अनेक को गलत प्रयोग करने की आदत में सुधार होगा।

    अभय तिवारी said...

    वक़्त फ़ारसी नहीं अरबी शब्द है..
    व्यवहार में व का ब हो जाना और क का ख हो जाना आम चलन है मगर ये समझ नहीं आया कि त कैसे श में बदलेगा..?
    आप के अनुसार बख्त और बख्श, वक़्त के बिगड़े हुए रूप हैं। मेरी समझ में फ़ारसी जैसी शास्त्रीय भाषा में तद्भव और अपभ्रंश शब्दों की जगह नहीं है.. मगर मेरा ज्ञान सीमित है और आप ने कुछ लिखा है तो किसी आधार पर ही लिखा होगा इसलिए आप से अपेक्षा करता हूँ कि इस पर थोड़ा और प्रकाश डाल कर मेरा भ्रम दूर करें..

    पंगेबाज said...

    कित्ते सारे बख्तावर बक्शे तूने खुदा ?

    Dr. Chandra Kumar Jain said...

    बात साफ़ है !
    वक़्त बर्बाद करना मतलब
    जीवन का वह हिस्सा खो देना है.
    अजित जी,
    आप 'सई बखत' पर सही समय ही नहीं
    समय के सही मूल्य की चेतना जगा देते हैं.
    आपकी यह पोस्ट भी लाज़वाब बख्शीश ही है भाई.
    खुदा आपके नेक कामों की नेमत बख्शे मुसलसल !
    ====================================
    शुभकामनाएँ
    डॉ.चन्द्रकुमार जैन

    अनुराग said...

    एक ओर दिन की शुरुआत....

    mamta said...

    आगे की कड़ी का इंतजार है।

    अभिषेक ओझा said...

    भगवान् पर अर्थ, अनर्थ दोनों पढ़ा ... अगली कड़ी का इंतज़ार है.

    विवेक सिँह said...

    अब हम आपकी तारीफ मेँ का लिखेँ सब तो औरन्नेँ लिखि दयौ.

    शोभा said...

    सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई।

    श्रद्धा जैन said...

    Ajeet ji
    waqt ki keemat wahi samjhega jo bhaut kuch karna chata hai padhna chata hai jise pata hai ki gyaan kitna vishaal hai jise samet pana bhaut mushkil hai

    bakht aur bakhsh ke shabdon ke meaning jaante hue bhi unhe dubara padhna achha laga

    Lavanyam - Antarman said...

    अजित भाई,
    न जाने क्यूँ
    वही गीत याद आ गया ..
    " न वो खम है जुल्फे अयाज़ मेँ "
    ये लाइन हमेशा मन मेँ कहीँ टँगी रहती थी
    .."खम" शब्द को पढते ही,
    फिर गुनगुना लिये ..:)
    और आज "बख्तावर " घोडे की याद आ गई !
    जो एक साँताक्रुज़, मुम्बई के सेठ का
    रेस होर्स था और कई रेस मेँ पहला आया था !
    अपने मालिक को
    "किसमतवाला" बनाया था उसने :)
    --
    स स्नेह,
    - लावन्या

    Radhika Budhkar said...

    बहुत अच्छी तरह आपने इन शब्दों की व्याख्या की हैं दादा .बधाई

    अभिराम said...

    कमबख्त वक्त ही ख़राब है. वक्त बे वक्त हमारा कंप्यूटर बिगड़ जाता है और हम आपकी पोस्ट को समयसर पढने से चूक जाते हैं. खैर देर आए दुरुस्त आए, देरी के लिए हमें बख्श दे दादाश्री. :-)

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