Tuesday, September 9, 2008

ईंट की आराधना [भगवान-4]

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" हे इष्टिका! तुम मां, प्रमा और प्रतिमा, हो। तुम ऊष्णिका (ताप को सोख लेनेवाली) हो, पृथ्वी हो "
तंत्र शास्त्र की नादसाधना में देवनागरी का ह्रस्व स्वरवर्ण हरि, ब्रह्ममय माना जाता है। हिन्दी-संस्कृत में ईश्वर के अर्थ में इष्ट या इष्टदेव शब्द भी प्रचलित है। यूं इष्ट का अर्थ होता है इच्छित, प्रिय, अभिलषित, पूज्य, आदरणीय आदि। इच्छा, इषणा यानी अभिलाषा , कामना जैसे शब्द भी इष् से ही बने हैं। देवनागरीके दीर्घ स्वरवर्ण में निहित सूर्य का संकेत ईश में परमसत्ता के अर्थ में व्याप्त हो गया।
ईशान में सूर्य का अर्थ में फिर प्रकट हुआ। यहां वर्ण [ह्रस्व इ] की व्याख्या ज़रूरी है। यानी कामना करना, अभिलाषा करना। गौरतलब है कि और दोनों वर्णों का एक अर्थ कामदेव भी है। इषः शब्द का अर्थ भी शक्तिशाली और बलवान होता है। मनुष्य की वृत्ति रही है कामना या अभिलाषा करना, चाहना। ईश्वर की कल्पना के बाद मनुष्य ने अपने इष्ट को पाना भी चाहा। इच्छा शब्द इष् से ही बना है। इष्ट का अर्थ है जिसकी कामना की जाए। ईशदर्शन की इच्छा से ही मानव ने मिट्टी की सिल्लियां बनाईं और उसके घेरे में सुरक्षापूर्वक अग्नि को प्रज्जवलित किया, उसे ससम्मान सुरक्षित रखा। अग्नि का यह आह्वान और प्रतिष्ठान सूर्योपासक समाज के विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव था।
त्यंत प्राचीनकाल में यही पहली यज्ञवेदिका रही होगी। कालांतर में मनुष्य ने प्रकृति की अन्य शक्तियों में विभिन्न देवों की कल्पना की। अग्नि प्रमुख देव रहा मगर अब वह परमशक्ति नहीं बल्कि परम के अंग रूप में स्वीकार्य था, परम की प्राप्ति में माध्यम हो गया। मनुष्य ने अभीष्ट की पूर्ति अर्थात देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अपनी प्रिय वस्तुएं– सर्वप्रथम आहार सामग्री यज्ञवेदी में होम करनी शुरू कीं। इष्ट की कामना से यज्ञ ने अनुष्ठान का रूप ऐसे ही लिया। चूंकि यज्ञ इष्ट प्राप्ति का साधन बना इसलिए यज्ञ का एक नाम इष्ट भी हो गया। अग्नि को प्रतिष्ठित करने के लिए मिट्टी की जिन चौकोर आधार वाली शिलाओं का निर्माण हुआ उन्हें इष्टिका या इष्टका कहा गया। इस शब्द का संस्कृत से प्राकृत होते हुए हिन्दी तक रूपपरिवर्तन कुछ यूं रहा इष्टिका > इष्टका > इट्टिगा > इट्टी > ईंट यानी आजकल भवननिर्माण के काम आनेवाली प्रमुख आधार सामग्री। स्पष्ट है कि प्रारंभ में मिट्टी से निर्मित शिलाएं सिर्फ यज्ञवेदी के निमित्त ही बनाई जाती थीं। तब इन्हें अग्नि में भी नहीं पकाया जाता था। विकासक्रम मे मनुष्य ने देखा कि यज्ञोपरांत अग्निवेदी के ताप से मिट्टी की शिलाएँ अर्थात ईंटें बेहद मज़बूत हो गई हैं सो उसने इनसे भवन निर्माण शुरू किया और ऐसे भवनों को इष्टालयम या इष्टगृहम् कहा गया। कहने की ज़रूरत नहीं कि यहां आस्था और विश्वास के बाद विज्ञान प्रभावी हो रहा है, यानी तपाने से ईंटें मजबूत होती हैं यह विज्ञान सम्मत तथ्य मनुष्य ने नैसर्गिक शक्तियों में आस्था और विश्वास की प्रक्रिया के दौरान ही परखा और जाना। ईंटों को अत्यंत पवित्र दर्जा प्राप्त था। वैदिक संस्कृति में तो ईंटों की स्तुति की जाती थी। यजुर्वेद में यज्ञ सम्पन्न करानेवाला पुरोहित ईंट की स्तुति में कहता है–
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" हे इष्टिका ! तुम मां, प्रमा (मातामही), और प्रतिमा (देवीसदृश) हो। तुम ऊष्णिका (ताप को सोख लेनेवाली) हो, पृथ्वी हो, तुम ही द्यू (आकाश), नक्षत्र, वाणी हो। मन हो तुम, कृषि, हिरण्य, गौ, अश्व, विश्वेदेवा भी तुम हो। तुम सूर्य ,तुम सोम हो। रुद्र हो तुम आदित्य हो, तुम ही मरुत भी हो। बृहस्पति, इन्द्र, वरुण और दीप्ति भी तुम हो।"
यूं दुनिया में सबसे पुरानी ईंटों के प्रमाण साढ़े सात हजार साल पहले दजला फरात के दोआब में बसी सुमेरी सभ्यता से मिले हैं। मिस्र और सिन्धु घाटी की सभ्यता में भी आग में तपी मजबूत और धूप में तपी कच्ची ईंटे काम में लाई जाती थीं। कुल मिलाकर यज्ञवेदी में अग्नि पूजा का अनुष्ठान इष्ट प्राप्ति का निमित्त बना। यज्ञवेदी ही इष्ट कहलाई। निर्माण की शिलाएं बनीं इष्टका जो बनी ईंटें। आज के दौर में भी निर्माण से पहले नींव के जिस पत्थर या आधारशिला की पूजा का अनुष्टान होता है वह यही इष्टिका है। इसके बावजूद इन्सान के मन में जब आया है उसने समाज की पुण्यकृतियों, संस्कृतियों की ईंट से ईट बजाई है।
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11 कमेंट्स:

Lavanyam - Antarman said...

प्रमा नाम बडा प्यारा है !
सारी जानकारी फिर बडी रोचक लगी !
-- लावण्या

Sanjay said...

इष्‍ट से ईंट तक... बड़ा लंबा सफर है यह तो.. अच्‍छी जानकारी मिली. और यह तो बताइए कि मनुश्‍य सही है या मनुष्‍य? अब तक तो मनुष्‍य ही पढ़ा और लिखा है.

दिनेशराय द्विवेदी said...

सत्यम् शिवम् सुंदरम्! आज के आलेख के लिए इस से सुंदर शब्द नहीं मिले।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

आज के दौर में भी निर्माण से पहले नींव के जिस पत्थर या आधारशिला की पूजा का अनुष्टान होता है वह यही इष्टिका है। ये अलग बात है कि इसके बावजूद इन्सान के मन में जब आया है उसने समाज की पुण्यकृतियों, संस्कृतियों की ईंट से ईट बजाई है।
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आप शब्द चर्चा के बीच
बड़ी सहजता से कुछ ऐसा
कह जाते हैं जिस पर गौर करें तो
बड़ा संदेश निहित मिलता है....इष्ट प्राप्ति के
निमित्त यज्ञवेदी के निर्माण की आधार शिला को भी
मनुष्य अपनी नासमझी से क्या सिला दे रहा है, इसका
उदाहरण है ऊपर अंकित आपका मंतव्य.....आभार,अजित जी.
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चन्द्रकुमार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक और बहुत ही बढ़िया

Gyandutt Pandey said...

ईंट से ईट बजाई है। > सही है - भगवान से भगवान ही बजाये हैं!

अजित वडनेरकर said...

@संजय
बंधुवर मनुष्य ही सही है। मुझे लगा कि आप मज़ाक कर रहे हैं। देखा तो मैने मनुश्य लिखा था। प्रूफ रीडिंग में चूक हुई। शुक्रिया ध्यान दिलाने का।

Swati said...

badhiya hai

अभिषेक ओझा said...

बढ़िया, ज्ञानवर्धक !

pankaj srivastava said...

अजित भाई,
टिप्पणी पहली बार कर रहा हूं। पर चोरी-चोरी न जाने कब से आपका ब्लाग पढ़कर ज्ञानी होने की धौंस जमाता रहता हूं। आपसे ये हकीकत स्वीकार न करना कृतघ्नता होगी। आप बेहद महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। इस जमाने पर जब भाषा ही प्राथमिकता में न हो, तो शब्दों के सफर पर कौन ध्यान देता है।..एक निवेदन, अवध के जिस इलाके में मेरा गांव है वहां चिमटे के लिए दसपना शब्द का इस्तेमाल होता है। गांव छूटा, शहर और फिर महाशहर में आना हुआ, पर पिता जी का दसपना बोलना नहीं छूटा। एक बार विचार किया तो लगा कि शायद ये दस्त+पनाह से बना होगा यानी हाथ की सुरक्षा करने वाला। क्या सही कह रहा हूं...जरा ज्ञान वर्धन करें..आभारी रहूंगा...
पंकज श्रीवास्तव

डा. अमर कुमार said...

आत्मसात करने के लिये अभी कई बार पढ़ना पड़ेगा,
अतएव टिप्पणी करने का अधिकार तो प्राप्त कर लूँ , मेरे
लिये तो गरिष्ठ पोस्ट है !

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