Monday, January 5, 2009

सिक्का-कहीं ढला, कहीं चला [सिक्का-1]

जेम्स द्वितीय के ज़माने की ब्रिटिश गिन्नी


देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है
फुटकर मुद्रा या छुट्टे पैसों के लिए सिक्के से बेहतर हिन्दी उर्दू में कोई शब्द नहीं है। दोनों ही भाषाओं में मुहावरे के तौर पर भी इसका प्रयोग होता है जिसका अर्थ हुआ धाक या प्रभाव पड़ना। मूल रूप से ये लफ्ज अरबी का है मगर हिन्दी में सिक्के के अर्थ में अग्रेजी से आया। हिन्दी में फकत ढाई अक्षर के इस शब्द के आगे पीछे कभी कई सारे अक्षर भी रहे हैं।
अरबी मे मुद्रा की ढलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले धातु के छापे या डाई को सिक्कः (सिक्काह) कहा जाता है जिसका मतलब होता है रूपया-पैसा, मुद्रा,मुहर आदि । इसके दीगर मायनों में छाप, रोब, तरीका-तर्ज़ आदि भाव भी शामिल हैं इसीलिए हिन्दी-उर्दू में सिक्का जमाना या सिक्का चलाना जैसे मुहावरे इन्ही अर्थों में इस्तेमाल होते रहे हैं। पुराने ज़माने में भी असली और नकली मुद्रा का चलन था। मुग़लकाल में सिक्कए-कासिद यानी खोटा सिक्का और सिक्कए-राइज़ यानी असली सिक्का जैसे शब्द चलन में थे। अरबों ने जब भूमध्य सागरीय इलाके में अपना रौब जमाया और स्पेन को जीत लिया तो यह शब्द स्पेनिश भाषा में भी जेक्का के रूप में चला आया। जेक्का का ही एक अन्य रूप सेक्का भी यहां प्रचलित रहा है। मगर वहां इसका अर्थ हो गया टकसाल, जहां मुद्रा की ढलाई होती है। अब इस जेक्का यानी टकसाल में जब मुद्रा की ढलाई हुई तो उसे बजाय कोई और नाम मिलने के शोहरत मिली जेचिनो के नाम से । जेचिनो तेरहवीं सदी के आसपास सिक्विन शब्द के रूप में ब्रिटेन में स्वर्ण मुद्रा बनकर प्रकट हुआ।

पंद्रहवीं सदी के आसपास अंग्रेजों के ही साथ ये चिकिन या चिक बनकर एक और नए रूप में हिन्दुस्तान आ गया जिसकी हैसियत तब चार रूपए के बराबर थी।

किस्से कहानियों में अशरफी, मोहर जितना जिक्र ही गिन्नी का भी है। गिन्नी ब्रिटिश स्वर्णमुद्रा थी और इसका उच्चारण था गिनी। हिन्दुस्तान के सर्राफा व्यापार की शब्दावली में सोने के भावों के संदर्भ में गिन्नी का उल्लेख आए दिन होता है

यही चिक तब सिक्का कहलाया जब इसे मुगलों ने चांदी में ढालना शुरू किया। आज ब्रिटेन में सिक्विन नाम की स्वर्णमुद्रा तो नहीं चलती मगर सिक्विन शब्द बदले हुए अर्थ में डटा हुआ है। महिलाओं के वस्त्रों में टांके जाने वाले सलमे-सितारों जैसी चमकीली सजावटी सामग्री सिक्विन के दायरे में आती है। जाहिर सी बात है कि सजाने से किसी भी चीज़ की कीमत बढ़ जाती है। यह भाव स्वर्णमुद्रा की कीमत और उसकी चमक दोनों से जुड़ रहा है। देखा जाए तो अरबी के इस छापे की छाप इतनी गहरी रही कि स्पेनी, अंग्रेजी सहित आधा दर्जन यूरोपीय भाषाओं के अलावा हिन्दी उर्दू में भी इसका सिक्का चल रहा है।

क अन्य स्वर्णमुद्रा थी गिन्नी जिसका चलन मुग़लकाल और अंग्रेजीराज में था। दरअसल गिन्नी का सही उच्चारण है गिनी जो कि उर्दू-हिन्दी में बतौर गिन्नी कहीं ज्यादा प्रचलित है। मध्यकाल में अर्थात करीब 1560 के आसपास ब्रिटेन में गिनी स्वर्णमुद्रा शुरू हुई। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि अफ्रीका के पश्चिमी तट पर स्थित गिनी नाम के एक प्रदेश से व्यापार के उद्धेश्य से ब्रिटिश सरकार ने इसे शुरू किया था। गौरतलब है कि सत्रहवीं सदी में पश्चिमी अफ्रीका के इस क्षेत्र पर यूरोपीय देशों की निगाह पड़ी। अर्से तक यह प्रदेश पुर्तगाल और फ्रांस का उपनिवेश बना रहा। गिनी को अब एक स्वतंत्र देश का दर्जा प्राप्त है। गिनी का इस क्षेत्र की स्थानीय बोली में अर्थ होता है अश्वेत व्यक्ति। आस्ट्रेलिया के उत्तर में प्रशांत महासागर में एक द्वीप समूह है न्यूगिनी जिसके साथ लगा गिनी नाम भी अफ्रीकी गिनी की ही देने है। इस द्वीप का पुराना नाम था पापुआ। मलय भाषा परिवार के इस शब्द का अर्थ होता है घुंघराले बाल। स्पेनियों ने इस द्वीप को ये नाम यहां के मूल निवासियों को इसी विशेषता के चलते दिया। दिलचस्प है कि अफ्रीकी गिनी का नाम भी उसके मूलनिवासियों के रंग के आधार पर पड़ा था। इस द्वीप का पश्चिमी हिस्सा इंडोनेशिया का हिस्सा है जबकि पूर्वी हिस्सा पापुआ न्यूगिनी कहलाता है और स्वतंत्र देश है।
संशोधित पुनर्प्रस्तुति

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15 कमेंट्स:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सिक्का जम ही गया . गिन्नी की कहानी भी रोचक लगी . आज भी हमारे यहाँ शादिओं मे गिन्नी मिलती है कहीं कहीं . और तो और आज कल गिन्नी लगे आभूषन फैशन मे है

P.N. Subramanian said...

सिक्के का सफरनामा उत्कृष्ट रहा. हमें लगता है की गिन्नि शुद्ध स्वर्ण मुद्रा नहीं रही. अर्हात मिलावट ज़्यादा थी. आभार.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सिक्के , टके, गिन्नी, मुद्रा सारे ही रोचक रहे अजित भाई नित नयी बातों का सफर है यह शब्दों का सफर

अभिषेक ओझा said...

सिक्कों की श्रुंखला ने अपना सिक्का बखूबी जमाया है. इस पोस्ट में गिनी वाली जानकारी बड़ी अच्छी रही.

अल्पना वर्मा said...

बहुत ही रोचक और जानकारी भरा लेख -आभार सहित

यह कमेन्ट बॉक्स eng-से हिन्दी change करने वाला लगा कर ,आप ने बहुत अच्छा किया.अच्छी सुविधा हो गयी.

अशोक मधुप said...

बहुत लाभकर लेख।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सदा की तरह बेहतरीन!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

इस पोस्ट का सिक्का भी चल गया !
वैसे ब्लाग जगत में अपने इस
सफर की धाक तो अरसे से जमी हुई है !!
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आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

शब्दावली का सिक्का चलता रहे, यही कामना है!

विवेक सिंह said...

आपका सिक्का चलता है जी हमारे मन पर !

विष्‍णु बैरागी said...

अफलातूनजी ने मुझे 'गिन्‍नी' के एक और स्‍वरूप से परिचित कराया। बंगाल में 'गृहिणी' लोक प्रचलन में आकर 'गिन्‍नी' बन गई।
'गिन्‍नी' आज भी चलन में है। कुछ परिवारों में बच्चियों को, लाड से 'गिन्‍नी' कह कर पुकारा जाता है।

ताऊ रामपुरिया said...

आप इतने रोचक तरीके से जानकारी देते हैं कि मजा आ जाता है. लाजवाब सफ़र करवा रहे हैं आप. बहुत धन्यवाद.

रामराम.

Amit said...

बहुत ही रोचक और जानकारी भरा लेख.........

रंजना said...

शब्दों के इस सफर के क्या कहने.......
ज्ञानवर्धन हुआ.एक बार फ़िर आभार !

Shastri said...

प्रिय अजित, ऐसा कैसे हो सकता है कि आप "सिक्का" विषय पर लिखें और सिक्का-प्रेमी मैं वहां न पहुंचूँ !! आलेख बहुत पसंद आया.

मुगल काल के सिक्कों पर फारसी में "सिक्का" शब्द अकसर मिलता है.

सस्नेह -- शास्त्री

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