Wednesday, April 1, 2009

फसल के फ़ैसले का फ़ासला

चूंकि फसल के उत्पन्न होने में किसान की मेहनत और प्रयास शामिल हैं अतः उपज का भाव स्पष्ट है। यह सचमुच किसान की मेहनत का ही फल होता है। Grazing rye web
खे ती के संदर्भ में उपज या पैदावार के लिए सबसे आम हिन्दी शब्द फसल है जिसका इस्तेमाल हर वर्ग के लोग बड़ी सहजता से करते हैं। फसल के विविध रूप भी प्रचलित है। मूलतः यह अरबी ज़बान का शब्द है जो बरास्ता फारसी हिन्दुस्तानी में दाखिल हुआ। अरबी में इसका रूप है फ़स्ल
ज्यादातर अरबी शब्द तीन अक्षरों वाली धातुओं से बनते हैं फस्ल भी फ-स-ल fsl ध्वनियों से बना है। फस्ल का मूलार्थ है अंतर, दूरी या अंतराल। गौर करें ऋतुचक्र पर। एक मौसम के बाद दूसरा मौसम आता है। दो ऋतुओं के बीच स्पष्ट अंतराल होता है। एक के बाद एक बदलते वर्ष के काल खंडों को इसलिए फस्ल कहा गया क्योंकि एक निश्चित अंतर उनमें है अर्थात काल, समय या वक्त का भाव भी फस्ल में है। पैदावार या उपज के अर्थ में फ़स्ल को फसल नाम बाद में मिला, पहले इसका मतलब समय, अंतराल, हिस्सा, अनुभाग ही था। एक खास मौसम क्या है? समय चक्र का विशेष अनुभाग ही न! फस्ले बहार या फस्ले गुल का अर्थ वसंत ऋतु से ही है। इसी तरह फस्ले खिज़ां यानी पतझड़ का मौसम। यहां मौसम के रूप में फस्ल शब्द का मतलब साफ नजर आ रहा है। बुवाई के बाद जब पौधों की वृद्धि की तयशुदा मियाद होने के वक्त को फस्ल कहा जाता जिसकी राह देखी जाती। इसे फ़स्ल आना कहते। बाद में रूढ अर्थ में इसका मतलब पैदावार या उपज हो गया। अंश, हिस्सा के तौर पर किसान की मेहनत का प्रकृति द्वारा दिया गया हिस्सा ही है फसल। इसी तरह किसी पुस्तक के अलग अलग अध्यायों को भी फस्ल ही कहते हैं।
अंतर, अंतराल या दूरी के अर्थ में फ़स्ल से ही बना है फासला। दो फसलों के बीच का वक्त ही फासला कहलाता था। यह अंतराल ही समय का भी प्रतीक है और दूरी का भी। अंतराल क्या है? एक बिंदु से दूसरे बिंदु के बीच का फर्क। इसे चाहे तो समय से माप लें या दूरी से। यूं अंतराल में दूरी और काल दोनों का ही समावेश होता है। प्राचीन बस्तियां परकोटों से घिरी होती थीं जिन्हें फ़सील कहते थे। परकोटा, या किले की दीवार आबादी और वीराने में फर्क करती थी, अंतर पैदा करती थी। शहर और वीराने का फासला जो बताए, वही है फ़सील। हालांकि हिन्दी में परकोटा, दीवार या चाहरदीवारी के अर्थ में फसील शब्द कम प्रचलित है मगर इसका इस्तेमाल लिखत-पढ़त की भाषा में होता है। न्याय के लिए हिन्दी का सर्वाधिक प्रचलित शब्द है फैसला जो इसी कड़ी का हिस्सा है। वैसे फैसला का शुद्ध अरबी रूप है फैसलः। इसी तरह फैसल का मतलब होता है न्यायकर्ता। किसी ज़माने में दो फसलों के बीच के अंतराल में फैसला आ जाता था। आज यह फासला दो फसलों का नहीं दो जन्मों से भी ज्यादा का हो गया है। फैसला भी एक उपलब्धि है।

Justice ... किसी ज़माने में दो फसलों के बीच के अंतराल में फैसला आ जाता था। आज यह फासला दो फसलों का नहीं दो जन्मों से भी ज्यादा का हो गया है।...

न्याय की तराजू पर दोनों पक्षों को तौलने के बाद जो अंतर मालूम होता है वही फैसला होता है।
सल के अर्थ में पैदावार शब्द भी फारसी का ही है। यह बना है फारसी के पैदा शब्द से जिसका अर्थ है उत्पन्न, आविर्भूत, प्रसूत आदि। चूंकि जो पैदा होता है, वह प्राप्त होता है, हासिल होता है इसीलिए इसे हुसूल भी कहते हैं। यह हिन्दी में आमतौर पर इस्तेमाल नहीं होता मगर इसी कड़ी का हासिल शब्द खूब इस्तेमाल होता है। सरकार जब पैदावार पर टैक्स लगाती है तो उसे महसूल कहते हैं। गौर करें यह हुसूल से पहले उपसर्ग लगने से ही बना है। महसूल आम हिन्दी में इस्तेमाल होता है। पैदा शब्द की रिश्तेदारी पिदर से है जिसका अर्थ होता है पिता अथवा जन्मदाता। पिदर से ही बना है पैदा शब्द। पिदर का संबंध संस्कृत के पितृ से है। भारोपीय भाषा परिवार में पिता के लिए इससे मिलते जुलते शब्दों का प्रचलन है। इसी क्रम में अंग्रेजी का फादर शब्द भी आता है। फसल किसान के लिए संतान की तरह होती है, जाहिर है वह उसे पिता की तरह ही पालता-पोसता है। इसीलिए वह पैदावार है।  फसल के लिए हिन्दी का एक अन्य शब्द है उपज जो बोलचाल में खूब प्रचलित है। यह बना है उपजनः यानी उप+जन के मेल से। जन का मतलब होता है जन्मना, उत्पन्न होना। इसमें उप जैसे प्रसिद्ध उपसर्ग का भाव है चेष्टा, प्रयत्न आदि। चूंकि फसल के उत्पन्न होने में किसान की मेहनत और प्रयास शामिल हैं अतः उपज का भाव स्पष्ट है। यह सचमुच किसान की मेहनत का ही फल होता है।

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16 कमेंट्स:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

विद्वान लेखक ने फसल शब्द की तह में जाकर
इसका अच्छा विवेचन किया है।
फसल, फासले, फसला, फसील सभी का रोचक
ढंग से वर्णन किया गया है।
भाई वडनेकर जी!
आपको अन्तर्राष्ट्रीय महामूर्ख दिवस
की शभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

दो फसलो के बीच मे फैसल हो जाता था मामला , जानकर आश्चर्य हुआ आज तो सही लिखा आपने दो जन्म भी कम है . आज ही जो खेतो मे गेहूं कटने को खडा है उसे फसल कहू उपज कहू समझ नहीं आ रहा

अशोक पाण्डेय said...

बढि़या जानकारी, आभार।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

पोस्ट क्या
फसले बहार ही है यह साहब !
=========================
....और हाँ दो फसलों के बीच
जन्मान्तर के फासले की बात
बात की बात में कर गए आप !
तीसरे खम्भे की विडंबना पर
गजब किया दृष्टिपात !!
==============================
शुक्रिया
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

kanchan said...

aap ki jaankariya hamesha gyanvarddhan karati hai.n

shukriya

Sanjeet Tripathi said...

पहले कौतुहल होता था कि ये शब्द कहां से चलकर कहां जुड़ जाते हैं, आपका ब्लॉग इस कौतुहल को शांत करने में सफल है।
पत्रकारिता के जो नए छात्र सलाह मांगते हैं भाषा, शब्द आदि के संदर्भ में मैं उन्हें यही सलाह देता हूं कि आपके ब्लॉग का रोजाना अध्ययन करें ताकि शब्द संग्रह तो बढ़े ही और शब्दों की उत्पत्ति, व्युत्पत्ति भी समझ में आए।

नि:संदेह आपका ब्लॉग इस ब्लॉग जगह की अमूल्य धरोहर बन चुका है।

शुक्रिया ज्ञानवर्धन के लिए।

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हालंकि बड़ी व्यस्तता के दौर में समय निकाल कर मैंने पढ़ा, पर पढ़ कर मज़ा आ गया. बधाई अजित जी आपको. अब तो लगता है कि अगर हम लोगों के बीच इतनी लम्बी भौतिक फस्ल न होती और हमारे निरंतर संवाद बने रहने की सुविधा होती तो शायद कुछ बड़ी ख़ुराफ़ात हम लोग मिल कर कर सकते थे.
और हाँ, इस लाइन के लिए ख़ास तौर से बधाई :

किसी ज़माने में दो फसलों के बीच के अंतराल में फैसला आ जाता था। आज यह फासला दो फसलों का नहीं दो जन्मों से भी ज्यादा का हो गया है। फैसला भी एक उपलब्धि है।

हरि जोशी said...

फसल, फस्‍ल, फैसला, फादर....कई शब्‍दों का सफरनामा जाना। आभार।

सचिन .......... said...

फासला कितना कम हो जाता है शब्दों की रिश्तेदारी देखकर। कितनी कितनी यात्राओं में घिसे हैं ये शब्द। फिर शुक्रिया

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत अच्छा आलेख है. अब फैसले में अंतराल बहुत विस्तृत हो चुका है।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

शब्दोँ के सफर के साथ हमने भी ये फासला तै कर लिया खुशी खुशी :)
- लावण्या

दीपा पाठक said...

हमेशा की तरह की बढिया पोस्ट। धन्यवाद फिर से।

Sanjay said...

बहुत ही शानदार पोस्ट! पढ़ कर आनंद आ गया बड़े भाई.

kiran rajpurohit nitila said...

Ajit ji
sachmuch bahut rochk.
upaj ka teesra hissa jo jameen ke malik ko milta hai jameen kiraye ke roop me kastkar dawara. Khareef ki fasal me.Rabi ke fasal me panchva hissa milta hai. hamare gav me jageerdari paratha me prachalit hai.
Kiran Rajpurohit Nitila

kiran rajpurohit nitila said...

Ajit sa
adhoori pratikriya ke liye sorry.
asal me hasil ke liye likha tha.isko godwad anchal(pali jila-rani,falna,nadole,bali) bhog bhi kaha jata hai.
kiran rajpurohit nitila

Dr.Bhawna said...

यहाँ आपके ब्लॉग पर आकर नई-नई जानकारी मिलती है एक नया अर्थ मिला बहुत-२ धन्यवाद

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