Sunday, March 28, 2010

[नाम पुराण-5] सावधानी हटी, दुर्घटना घटी

पिछली कड़ियां-A.[नामपुराण-1]B.[नामपुराण-2]c.[नामपुराण-3] d [नाम पुराण-4]

...घाट या घाटी से जुड़े कई स्थान नाम हमारे आसपास मौजूद हैं जैसे उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी या राजस्थान में हल्दी घाटी...
बा दल या मेघ के लिए घटा शब्द भी प्रचलित है। शृंगार गीतों में घटा, काली घटा शब्द का खूब इस्तेमाल होता है। यहां भी मिलन का भाव ही है। दरअसल आसमान में उभरते बादलों के रूपाकार जब उमड़ते-घुमड़ते एक दूसरे में समाहित होते हैं, सम्मिलित होते हैं तब ऐसे मेघ-समूह को घटा कहते हैं। बादल के इकलौते टुकड़े को घटा नहीं कहा जा सकता बल्कि बादलों का समूह, समुच्चय ही घटा कहलाता है। आकाश में बादलों की सघन अवस्थिति को घटाटोप कहा जाता है। यह घटाटोप तब मुहावरे की अर्थवत्ता धारण करता है जब चारों ओर से आती मुश्किलों-परेशानियों का उल्लेख करने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। समुच्चय, इकट्ठा या एकत्रीकरण के लिए बोलचाल का शब्द जमघट है जो इसी मूल से आ रहा है। घटा के साथ जमा होने का भाव जमघट में स्पष्ट है। घटाटोप आसमान में होती है और जमघट आसमान के साथ जमीन पर भी होता है।
टना शब्द पर भी गौर कर लें। घटना का मूल अर्थ है कुछ होना, क्रिया, प्रयत्न, मिलाना, एक करना, किसी स्थान पर कुछ साकार करना आदि सब कुछ घटना के दायरे में आता है। प्रयत्न क्या है? इच्छाशक्ति को क्रिया से एकाकार करना ही प्रयास या कोशिश है। घटना या दुर्घटना शब्द भी हिन्दी के सर्वाधिक व्यवहृत शब्द हैं जो घटनम् से बने हैं। घटना व्यष्टि के समष्टि में बदलने की क्रिया भी है। जन्म एक घटना है और मृत्यु भी। मगर अकाल मृत्यु दुर्घटना है। काल, समय, पदार्थ, जीव आदि के संयोग अथवा दुर्योग को घटना या दुर्घटना कहते हैं। आमतौर पर सड़कों पर दो या दो से अधिक वाहनों के आपस में टकराने के संदर्भ में दुर्घटना शब्द का प्रयोग होता है। टकराने की क्रिया एक दूसरे में समाना ही है। घटना में निहित मिलने, एकाकार Vally-Of-Flowers-2 होने का भाव तब अधिक स्पष्ट होता है जब घटनम् में वि उसर्ग लगता है जिसमें अनस्तित्व का भाव है। विघटन यानी टूटना, दरकना, दोफाड़ होना। किसी समुच्चय का बंटवारा होना। एक विरोधाभास देखिए। घटना में निहित मिलाना, एक करना जैसे भावों पर दुर्घटना के सन्दर्भ में गौर करें। भिड़ंत दुर्घटना है। दो चीजों इतनी तेजी से टकराती हैं कि मिलन के फौरन बाद उनमें विघटन हो जाता है अर्थात वे क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसमें एक सूफियाना किस्म की नसीहत भी छुपी है। अगर किसी मेल-जोल में बहुत तेजी है तब सावधानी ज़रूरी है क्योंकि शायद यह अलगाव की निशानी भी हो सकती है। असंयत, अव्यावहारिक गति से बढ़ते रिश्तों का हश्र टूटना-बिखरना ही होता है।  सड़कों पर सरकारी नसीहत भी लिखी मिलती है-सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। सम्मिलन, प्रयत्न, क्रिया अथवा घटना को करानेवाला कारक ही घटक कहलाता है।
घाट सिर्फ मनुष्यों के नहाने का स्थान भर नहीं थे बल्कि वे नौकाओं का आश्रय स्थल भी थे। घट्टः में समाया आश्रय का भाव दिलचस्प है। इससे बने घाटी शब्द पर गौर करें। घाटी यानी ढलान। दो पर्वत श्रेणियों के बीच का संकरा मार्ग या रास्ता भी घाटी कहलाता है और दोनों पर्वतों की ढलानें भी घाटी कहलाती हैं। ढलान शब्द में स्थिरता नहीं बल्कि गति निहित है जो ऊंचाई से नीचाई की दिशा में होती है। दोनों ओर की ढलानों के शून्य बिंदु पर गति को विराम मिलता है। यही घाट है अर्थात आश्रय यहीं है। घट् धातु में निहित मिलन, जोड़ जैसे भाव इस संधिस्थल अर्थात घाट की सही व्याख्या है।  घाटी में द्वार या दर्रे का भाव तो निहित है। घाट या घाटी से जुड़े कई स्थान नाम हमारे आसपास मौजूद है। उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी, गोविंद घाट, भैरों घाटी, राजस्थान के अरावली क्षेत्र में दमारू घाटी, हल्दीघाटी आदि। घाटी पाकिस्तान के स्वात क्षेत्र में बिहा घाटी है। विश्वविख्यात सिन्धु घाटी की सभ्यता भी विशाल पुरातात्विक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। भारतीय प्रायद्वीप के पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र को पूर्वीघाट और पश्चिमी घाट कहते हैं। घाट से ही घाटा जैसा स्थानवाची शब्द भी बना है जैसे देवारी का घाटा, चीरवा का घाटा, झाड़ोल घाटा आदि। घोड़ाघाटी और घाटौली जैसे स्थान भी इसी कड़ी में आते हैं।
घाट का एक अर्थ चुंगी चौकी भी होता है। प्रायः दर्रा दो राज्यों या राजस्व क्षेत्रों की सीमा भी तय करता रहा है जहां से आवागमन पर शुल्क लगता है। घाट पर तैनात कर वसूलने वाले कार्मिक को घटपालः कहा जाता था जो बाद में घटवाल या घटवार के रूप में देशी बोलियों में इस्तेमाल होने लगा। आमतौर पर वनवासी क्षत्रिय समाज के लोगों को ही घाटपालः की जिम्मेदारी दी जाती थी। घटवार एक जातीय उपनाम भी है जो प्रायः वनवासी क्षत्रियों में होता है। -जारी

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9 कमेंट्स:

Sanjay Kareer said...

उदयपुर याद आ गया बड़े भाई। हल्‍दीघाटी, झाड़ोल घाटा... पुराने दिनों की यादें ताजा हो गईं। जब पहले पहल वहां गया था तो चौराया और घाटा जैसे शब्‍दों को सुनकर कई बार कनफ्यूज हो जाता था। बाद में मतलब समझने लगा तो मजा आने लगा। नाम पुराण बढि़या चल रहा है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संघटन किन्ही घटकों से मिल कर बनता है। घटक पृथक हों तो विघटन कहलाते हैं। यहाँ घट में एक इकाई का भाव है जो मिल कर बड़ी इकाई बना सकते हैं।

दीपक 'मशाल' said...

अजित सर, इस निरंतर ज्ञानवर्धन के लिए आपको नमन करता हूँ.

Arvind Mishra said...

रोचक ! कभी दरी और दर्रे का फर्क बताएं !

किरण राजपुरोहित नितिला said...

बढ़िया और उपयोगी जानकारी .

RAJMOHAN CHAUHAN said...

आपको साधुवाद। आपने इंटरनेट को सार्थक कर दिया है।

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्दों का सफर - बढ़ता रहे, कभी घटे न ।

शहरोज़ said...

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

Mansoor Ali said...

नामो का ये पुराण तो घट घट के भी बढ़ा,
जमघट ज़मीन पर तो फलक पर हुआ घटा,
घाटी की सैर में तो अटक ही गए थे हम,
इतने में 'कर' वसूलने 'घट्पाल' आ गया.

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